चाहत के इशारे कभी हमको नहीं आते

हज़ज मुसम्मन अख़रब मकफ़ूफ़ महज़ूफ़

मफ़ऊल मुफ़ाईलु मुफ़ाईलु फ़ऊलुन

 

221  1221  1221  122

चाहत के इशारे कभी हमको नहीं आते

ये चाँद -सितारे  कभी हमको नहीं आते

 

बोलो तो कभी ला दूँ मैं रातों में  तबाही

ये  दिन के उजाले कभी हमको नहीं आते

 

आवाज कहाँ देते  सितमगर यहाँ सब हैं

दो कौर  निवाले कभी हमको नहीं आते

 

सूखे से दरख्तों से क्या  साया भी  तलाशें

जादू यही  काले  कभी हमको नहीं आते

 

चौड़ा हुआ सीना मिरा  सुन कर तिरी बातें

पावों में दें छाले कभी हमको नहीं आते

 

सुशील यादव दुर्ग

मौलिक व अप्रकाशित"