by Sushil
on Saturday
24.10.26
कामिल मुसम्मन सालिम
मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन
11212 11212 11212 11212
मैं किसे तो याद करूँ कहो किसे भूलना पड़े है मुझे
ये मिरे नसीब की खामियाँ तुझे बोलना पड़े है मुझे
है निगाह में मिरे शहर की बनी सब बड़ी ये इमारतें
तिरी ही गली का पता बिना रुके पूछना पड़े है मुझे
हाँ मलाल कर रहा आदमी बना तो बना हूँ मै किसलिए
ये धड़कने ही न तो बोलती खूँ हूँ दौड़ना पड़े है मुझे
मैं मुगालता कहाँ पाले था जो खलल खयाल में डाले था
मिरी हरकतें भी अजीब थी कभी सोचना पड़े है मुझे
मुझे जिंदगी की दुआ ना दो , मिरे हाल पे यूं खफा ना हो
मै ना काबिले कहीं हर्फ हूँ ,यही जानना पड़े है मुझे
मिरे तार जुड़ गए हैं कहीं मिरी बात हो गई है कहीं
मै मगर तुझे यहाँ पे मिला अभी , टोकना पड़े है मुझे
ये सियासतों का है खेल भी कई करवटें भी बदल रहा
कभी मेरे पाले तू फेकता , कभी फेकना पड़े है मुझे
सुशील यादव दुर्ग
मौलिक व अप्रकाशित"
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मैं किसे तो याद करूँ कहो किसे भूलना पड़े है मुझे
by Sushil
on Saturday
24.10.26
कामिल मुसम्मन सालिम
मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन मुतुफ़ाइलुन
11212 11212 11212 11212
मैं किसे तो याद करूँ कहो किसे भूलना पड़े है मुझे
ये मिरे नसीब की खामियाँ तुझे बोलना पड़े है मुझे
है निगाह में मिरे शहर की बनी सब बड़ी ये इमारतें
तिरी ही गली का पता बिना रुके पूछना पड़े है मुझे
हाँ मलाल कर रहा आदमी बना तो बना हूँ मै किसलिए
ये धड़कने ही न तो बोलती खूँ हूँ दौड़ना पड़े है मुझे
मैं मुगालता कहाँ पाले था जो खलल खयाल में डाले था
मिरी हरकतें भी अजीब थी कभी सोचना पड़े है मुझे
मुझे जिंदगी की दुआ ना दो , मिरे हाल पे यूं खफा ना हो
मै ना काबिले कहीं हर्फ हूँ ,यही जानना पड़े है मुझे
मिरे तार जुड़ गए हैं कहीं मिरी बात हो गई है कहीं
मै मगर तुझे यहाँ पे मिला अभी , टोकना पड़े है मुझे
ये सियासतों का है खेल भी कई करवटें भी बदल रहा
कभी मेरे पाले तू फेकता , कभी फेकना पड़े है मुझे
सुशील यादव दुर्ग
मौलिक व अप्रकाशित"