by Sushil
on Saturday
24.10.26
मुज़ारे मुसम्मन अख़रब
मफ़ऊल फ़ाएलातुन मफ़ऊल फ़ाएलातुन
221-2122- //-221-2122
क्यों दूर हो गए तुम , हमको सजा दिला के
लानत मिली है हमको , रिश्ता सही निभा के
रखता हूँ पास अपने , मैं तारे आसमाँ के
जब हो जरूरतें तो , झोली भरूँ गिना के
था साथ जो हमारा , शायद वो चल ना पाता
शिकवा करें कहाँ पे ,आँसू कहीं गिरा के
बदनामियाँ लिखी थी , तेरे करीब साजन
हमने तो जिंदगी को, देखा है मुँह छिपा के
इक फूल चाहता था जूड़े तिरे सजाना
इस चाह को दबाया , ठोकर जरा सा खा के
अब लापता है माली , मौसम की आड़ लेकर
खामोश है नजारे , नुकसान बस उठा के
सीखा है आजकल ये , जो साथ है निभाना
हमने उसूल तोड़ा , कुछ खामियाँ बता के
सुशील यादव दुर्ग
मौलिक व अप्रकाशित"
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क्यों दूर हो गए तुम , हमको सजा दिला के
by Sushil
on Saturday
24.10.26
मुज़ारे मुसम्मन अख़रब
मफ़ऊल फ़ाएलातुन मफ़ऊल फ़ाएलातुन
221-2122- //-221-2122
क्यों दूर हो गए तुम , हमको सजा दिला के
लानत मिली है हमको , रिश्ता सही निभा के
रखता हूँ पास अपने , मैं तारे आसमाँ के
जब हो जरूरतें तो , झोली भरूँ गिना के
था साथ जो हमारा , शायद वो चल ना पाता
शिकवा करें कहाँ पे ,आँसू कहीं गिरा के
बदनामियाँ लिखी थी , तेरे करीब साजन
हमने तो जिंदगी को, देखा है मुँह छिपा के
इक फूल चाहता था जूड़े तिरे सजाना
इस चाह को दबाया , ठोकर जरा सा खा के
अब लापता है माली , मौसम की आड़ लेकर
खामोश है नजारे , नुकसान बस उठा के
सीखा है आजकल ये , जो साथ है निभाना
हमने उसूल तोड़ा , कुछ खामियाँ बता के
सुशील यादव दुर्ग
मौलिक व अप्रकाशित"