by sushil yadav
Sep 25
मुतदारिक मुसम्मन सालिम
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212 212 212 212
लोग ही जब नजर को चुराते रहे
पास मेरे खुदा ख़ूब आते रहे
ऐब तेरे कहीं जब छुपाते रहे
वो गिनाते रहे हम लजाते रहे
याद में थी गलतियाँ अनेकों जिसे
हम खता मान अपनी भुलाते रहे
ये मदारी बना आदमी आजकल
जाने क्या -क्या कहीं भी नचाते रहे
दोस्ती का जिसे पास था भी नहीं
हाथ दुश्मन से वो ही मिलाते रहे
आपदा में ये अवसर हमे जो मिला
हाथ आया कबूतर उड़ाते रहे
हमने सीखी नहीं होशियारी कभी
आबो दाना जरा सा बचाते रहे
सुशील यादव दुर्ग
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लोग ही जब नजर को चुराते रहे
by sushil yadav
Sep 25
मुतदारिक मुसम्मन सालिम
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212 212 212 212
लोग ही जब नजर को चुराते रहे
पास मेरे खुदा ख़ूब आते रहे
ऐब तेरे कहीं जब छुपाते रहे
वो गिनाते रहे हम लजाते रहे
याद में थी गलतियाँ अनेकों जिसे
हम खता मान अपनी भुलाते रहे
ये मदारी बना आदमी आजकल
जाने क्या -क्या कहीं भी नचाते रहे
दोस्ती का जिसे पास था भी नहीं
हाथ दुश्मन से वो ही मिलाते रहे
आपदा में ये अवसर हमे जो मिला
हाथ आया कबूतर उड़ाते रहे
हमने सीखी नहीं होशियारी कभी
आबो दाना जरा सा बचाते रहे
सुशील यादव दुर्ग