लोग  ही जब  नजर को   चुराते रहे

मुतदारिक मुसम्मन सालिम

फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन

212 212 212 212

 

लोग  ही जब  नजर को   चुराते रहे

पास मेरे खुदा   ख़ूब आते रहे

 

ऐब तेरे  कहीं जब  छुपाते रहे

वो गिनाते रहे हम लजाते रहे

 

याद में थी  गलतियाँ अनेकों जिसे

हम खता मान  अपनी भुलाते रहे

 

ये मदारी बना आदमी आजकल

जाने क्या -क्या कहीं भी नचाते रहे

 

दोस्ती का जिसे पास था भी नहीं

हाथ दुश्मन से वो ही मिलाते रहे

 

आपदा में ये अवसर हमे जो मिला

हाथ आया कबूतर उड़ाते रहे

 

हमने सीखी नहीं होशियारी कभी

आबो दाना जरा सा बचाते रहे

 

सुशील यादव दुर्ग