by sushil yadav
Sep 25
Muzare.a musamman aKHrab makfuuf mahzuuf
maf'uul faa'ilaat mufaa'iil faa'ilun
221 2121 1221 212
कातिल मुझे तू शहर का कहते रहा तो है
चेहरा मिरा करीब से देखा हुआ तो है
मेरी जुबां पे ताले पड़े थे कई दिनों
यकता मिरा गरीब कहीं बोलता तो है
अब कोतवाल शहर का निकला है गश्त में
मालूम उसको आज का सब हादसा तो है
ये इश्तिहार खाक से दीवार पर लगे
कोई नजर भी भूल से ही फेकता तो है
पर काट दो उड़ान से पहले अगर कहीं
हर बेजुबां बे -हाल हुआ चीखता तो है
मेरी गली गुजर के वो दिल में समा गई
थोड़ा इसी बहाने मेरा राबता तो है
रहमत है चाँदनी की बहारों का लुफ्त है
फिर चाहतें हैं साथ में उसकी दुआ तो है
सुशील यादव दुर्ग
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कातिल मुझे तू शहर का कहते रहा तो है
by sushil yadav
Sep 25
Muzare.a musamman aKHrab makfuuf mahzuuf
maf'uul faa'ilaat mufaa'iil faa'ilun
221 2121 1221 212
कातिल मुझे तू शहर का कहते रहा तो है
चेहरा मिरा करीब से देखा हुआ तो है
मेरी जुबां पे ताले पड़े थे कई दिनों
यकता मिरा गरीब कहीं बोलता तो है
अब कोतवाल शहर का निकला है गश्त में
मालूम उसको आज का सब हादसा तो है
ये इश्तिहार खाक से दीवार पर लगे
कोई नजर भी भूल से ही फेकता तो है
पर काट दो उड़ान से पहले अगर कहीं
हर बेजुबां बे -हाल हुआ चीखता तो है
मेरी गली गुजर के वो दिल में समा गई
थोड़ा इसी बहाने मेरा राबता तो है
रहमत है चाँदनी की बहारों का लुफ्त है
फिर चाहतें हैं साथ में उसकी दुआ तो है
सुशील यादव दुर्ग