कातिल  मुझे तू शहर का  कहते  रहा तो है

Muzare.a musamman aKHrab makfuuf mahzuuf

maf'uul faa'ilaat mufaa'iil faa'ilun

221 2121 1221 212

कातिल  मुझे तू शहर का  कहते  रहा तो है

चेहरा मिरा  करीब से देखा हुआ तो है

 

मेरी जुबां  पे ताले  पड़े थे कई  दिनों

यकता  मिरा गरीब  कहीं बोलता  तो है

 

अब कोतवाल शहर का निकला  है गश्त में

मालूम उसको आज  का सब   हादसा तो है

 

ये इश्तिहार खाक से दीवार पर लगे

कोई नजर भी भूल से ही फेकता  तो है

 

पर काट दो उड़ान से पहले अगर कहीं

हर  बेजुबां    बे  -हाल हुआ चीखता तो है

 

मेरी गली  गुजर के वो   दिल में  समा  गई

थोड़ा इसी बहाने  मेरा राबता   तो है

 

रहमत है चाँदनी की बहारों का लुफ्त  है

फिर चाहतें  हैं साथ में  उसकी दुआ तो है

 

सुशील यादव दुर्ग