जो  नाजुक दौर में  हिलता  रहा है

हज़ज मुसद्दस महज़ूफ़

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन

 

1222 1222  122

जो  नाजुक दौर में  हिलता  रहा है

वो  कुर्सी का  मिरा   पाया रहा है

 

ये हाले जार पर मेरे किसी के

खयालों का कसीदा आ  रहा है

 

हमारी जिंदगी का फैसला भी

अदालत में सुनाया जा रहा है

 

नकाबों में  छिपा है  आदमी भी

सजायें और कोई पा रहा है

 

अभी तो तंज कसता  हूँ नहीं मैं

वही इस लाश का कांधा  रहा है

 

चलो दीगर करें बातें जमाना

यहाँ  मनहूस  अब  साया   रहा  है

 

खिलाफत अब नहीं तुम कर सकोगे

किसी चंदे कहीं हिस्सा रहा है

 

बहुत चूसा लहू भी आदमी का

तिरा  किस किस से ये  सौदा  रहा है

 

कभी गौतम कभी गाँधी   बना वो

अहिंसा  दौर इक उनका रहा है

 

सुशील यादव दुर्ग