by sushil yadav
Sep 25
हज़ज मुसद्दस महज़ूफ़
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
1222 1222 122
जो नाजुक दौर में हिलता रहा है
वो कुर्सी का मिरा पाया रहा है
ये हाले जार पर मेरे किसी के
खयालों का कसीदा आ रहा है
हमारी जिंदगी का फैसला भी
अदालत में सुनाया जा रहा है
नकाबों में छिपा है आदमी भी
सजायें और कोई पा रहा है
अभी तो तंज कसता हूँ नहीं मैं
वही इस लाश का कांधा रहा है
चलो दीगर करें बातें जमाना
यहाँ मनहूस अब साया रहा है
खिलाफत अब नहीं तुम कर सकोगे
किसी चंदे कहीं हिस्सा रहा है
बहुत चूसा लहू भी आदमी का
तिरा किस किस से ये सौदा रहा है
कभी गौतम कभी गाँधी बना वो
अहिंसा दौर इक उनका रहा है
सुशील यादव दुर्ग
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जो नाजुक दौर में हिलता रहा है
by sushil yadav
Sep 25
हज़ज मुसद्दस महज़ूफ़
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन फ़ऊलुन
1222 1222 122
जो नाजुक दौर में हिलता रहा है
वो कुर्सी का मिरा पाया रहा है
ये हाले जार पर मेरे किसी के
खयालों का कसीदा आ रहा है
हमारी जिंदगी का फैसला भी
अदालत में सुनाया जा रहा है
नकाबों में छिपा है आदमी भी
सजायें और कोई पा रहा है
अभी तो तंज कसता हूँ नहीं मैं
वही इस लाश का कांधा रहा है
चलो दीगर करें बातें जमाना
यहाँ मनहूस अब साया रहा है
खिलाफत अब नहीं तुम कर सकोगे
किसी चंदे कहीं हिस्सा रहा है
बहुत चूसा लहू भी आदमी का
तिरा किस किस से ये सौदा रहा है
कभी गौतम कभी गाँधी बना वो
अहिंसा दौर इक उनका रहा है
सुशील यादव दुर्ग