आज कितनी यहाँ नर्म  कमजोर है जिंदगी

फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन

212 212 212 212 212

 

आज कितनी यहाँ नर्म  कमजोर है जिंदगी

लोग सब पीटते  शहर लतखोर है जिंदगी

 

एक बे जान सा  आदमी  है खड़ा बोलता

ढोल लेकर  गले  सामने  शोर है जिंदगी

 

शर्त मेरी नहीं मानता कोई भी  अजनबी

पालतू  सा  लिए फिर रहा ढोर है जिंदगी

 

सोचता हूँ मैं  अपनी सजा  काट लूँ  अब यहीं

बांटते बस जरा  तंग मैं बोर है  जिंदगी

 

सारी हमदर्दियाँ  आज भी  भूलता मै नहीं

जब हँसी  औ  खुशी पाँव इस ओर है जिंदगी

 

सुशील यादव दुर्ग