by sushil yadav
Sep 25
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212 212 212 212 212
आज कितनी यहाँ नर्म कमजोर है जिंदगी
लोग सब पीटते शहर लतखोर है जिंदगी
एक बे जान सा आदमी है खड़ा बोलता
ढोल लेकर गले सामने शोर है जिंदगी
शर्त मेरी नहीं मानता कोई भी अजनबी
पालतू सा लिए फिर रहा ढोर है जिंदगी
सोचता हूँ मैं अपनी सजा काट लूँ अब यहीं
बांटते बस जरा तंग मैं बोर है जिंदगी
सारी हमदर्दियाँ आज भी भूलता मै नहीं
जब हँसी औ खुशी पाँव इस ओर है जिंदगी
सुशील यादव दुर्ग
Cancel
आज कितनी यहाँ नर्म कमजोर है जिंदगी
by sushil yadav
Sep 25
फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन
212 212 212 212 212
आज कितनी यहाँ नर्म कमजोर है जिंदगी
लोग सब पीटते शहर लतखोर है जिंदगी
एक बे जान सा आदमी है खड़ा बोलता
ढोल लेकर गले सामने शोर है जिंदगी
शर्त मेरी नहीं मानता कोई भी अजनबी
पालतू सा लिए फिर रहा ढोर है जिंदगी
सोचता हूँ मैं अपनी सजा काट लूँ अब यहीं
बांटते बस जरा तंग मैं बोर है जिंदगी
सारी हमदर्दियाँ आज भी भूलता मै नहीं
जब हँसी औ खुशी पाँव इस ओर है जिंदगी
सुशील यादव दुर्ग