by sushil yadav
Sep 25
2122 2122 2122 212
रमल मुसम्मन महज़ूफ़
फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन
तू मुझे धोका दे कम से कम मैं पछता तो सकूँ
याद मुझको तू न आए दिल को समझा तो सकूँ
छोड़ कर अब जा रहा हूँ शहर को इस हाल में
दौर-ए-आफ़त भी अगर आए तुझे पा तो सकूँ
इस ज़माने का चलन मुझको सताने आ गया
पाँव उल्फ़त की सुहानी धूप फैला तो सकूँ
अश्क का कोई खिलौना हाथ आया है मिरे
रोकने वाला जो रोए, मन को बहला तो सकूँ
फ़ासिला होगा कभी तुमसे ये सोचा भी नहीं
ग़ैर तुमने कह दिया, ये दाग़ झुठला तो सकूँ
फिर समझ मेरी ठिकाने आ लगी है आज कल
हाँ बदलना है इसे ख्वाबों से कतरा तो सकूँ
अब शिकायत क्या करें हम, अब कहाँ भटके 'सुशील'
सादगी के दिन गए, ये बात बतला तो सकूँ
सुशील यादव दुर्ग
Cancel
तू मुझे धोका दे कम से कम मैं पछता तो सकूँ
by sushil yadav
Sep 25
2122 2122 2122 212
रमल मुसम्मन महज़ूफ़
फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन
2122 2122 2122 212
तू मुझे धोका दे कम से कम मैं पछता तो सकूँ
याद मुझको तू न आए दिल को समझा तो सकूँ
छोड़ कर अब जा रहा हूँ शहर को इस हाल में
दौर-ए-आफ़त भी अगर आए तुझे पा तो सकूँ
इस ज़माने का चलन मुझको सताने आ गया
पाँव उल्फ़त की सुहानी धूप फैला तो सकूँ
अश्क का कोई खिलौना हाथ आया है मिरे
रोकने वाला जो रोए, मन को बहला तो सकूँ
फ़ासिला होगा कभी तुमसे ये सोचा भी नहीं
ग़ैर तुमने कह दिया, ये दाग़ झुठला तो सकूँ
फिर समझ मेरी ठिकाने आ लगी है आज कल
हाँ बदलना है इसे ख्वाबों से कतरा तो सकूँ
अब शिकायत क्या करें हम, अब कहाँ भटके 'सुशील'
सादगी के दिन गए, ये बात बतला तो सकूँ
सुशील यादव दुर्ग