तू   मुझे धोका दे कम  से कम मैं  पछता तो सकूँ

2122 2122 2122 212

रमल मुसम्मन महज़ूफ़

फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाएलातुन फ़ाइलुन

2122  2122  2122  212

तू   मुझे धोका दे कम  से कम मैं  पछता तो सकूँ

याद मुझको तू न आए दिल को समझा तो सकूँ

 

छोड़ कर अब जा रहा हूँ शहर को  इस हाल में

दौर-ए-आफ़त भी अगर आए तुझे पा तो सकूँ

 

इस ज़माने का चलन मुझको सताने आ गया

पाँव उल्फ़त की सुहानी धूप  फैला तो सकूँ

 

अश्क का कोई खिलौना हाथ आया है मिरे

रोकने वाला जो रोए, मन को बहला तो सकूँ

 

फ़ासिला होगा कभी तुमसे ये सोचा भी नहीं

ग़ैर तुमने कह दिया, ये दाग़ झुठला तो सकूँ

 

फिर समझ  मेरी  ठिकाने आ लगी है आज कल

हाँ  बदलना  है  इसे ख्वाबों से कतरा तो सकूँ

 

अब शिकायत क्या करें हम, अब कहाँ भटके 'सुशील'

सादगी के दिन गए, ये बात बतला तो सकूँ

 

सुशील यादव दुर्ग