भाषा से भी बढ़ इक भाषा

है भाषा का उपकार बड़ा
बना दिया हमको इनसान।
भाषा से भी बढ़ इक भाषा
जिसकी होती नहीं जबान।

प्यारा-सा नवजात कभी जब
इस दुनिया में आता है।
ना शब्दों का बोध अभी बस
रोता है चिल्लाता है।
उसके रोते ही माँ तत्क्षण
अपना क्षीर पिलाती है।
कैसे जननी की थपकी से
धुन लोरी की आती है।
कैसे लाती है इक ममता
शिशु के होठों पर मुस्कान।
भाषा से भी बढ़ इक भाषा
जिसकी होती नहीं जबान।

कितनी गहरी उनकी भाषा
बोल नहीं जो पाते हैं।
रोम-रोम हर अंगों से जो
मन के भाव जताते हैं।
पढ़ो कभी जब ऑंखें उनकी
कुछ बात कहा करती हैं।
नदियाँ जैसे सहला तट को
चुपचाप बहा करती हैं।
खामोशी को पूजा हमने
माना पत्थर को भगवान।
भाषा से भी बढ़ इक भाषा
जिसकी होती नहीं जबान।

होता है जब वक्त सही तो
मिल कर सारे गाते हैं।
बुरे दौर में लाख पुकारो
सब बहरे हो जाते हैं।
जीवन की यह सहज रीत है
क्षण विपदा के लाती है।
नीति-धर्म से परिणय हो तो
सीख कई दे जाती है।
कठिन घड़ी में साथ निभाते
होते अक्सर वो अनजान।
भाषा से भी बढ़ इक भाषा
जिसकी होती नहीं जबान।


मौलिक व अप्रकाशित"