हरिगीतिका छंद

  

हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।

यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम लो।

करते  रहो  नित  भक्ति  प्रभु  की, नित्य प्रभु आराधना।

तब  बिन  कहे   हर  एक  होगी,  पूर्ण   मंगल  कामना।।   

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आ  जाइये  प्रभु  की  शरण  में,  मोक्ष  का  सुख  पाइये।

नित  गाइये  प्रभु  वन्दना  नित,  नाम  हरि का ध्याइये।  

संतोष    धन   उनको   मिलेगा, जो    जपेंगे    नाम  ये।

वह   मुक्त   होंगे  कष्ट  से  सब, छोड़कर  जग  धाम  ये।।

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जयकार शिव की कर रहे सब, पुण्य  सावन मास में।

अर्चक   चले   कांवड़   उठाए, प्रभु दरस विश्वास में।

शृंगार  करतीं  नव  लताएँ, पिय मिलन की आस में।

उपवास करतीं नारियाँ भी, प्रीति  सुख  उल्लास में।।

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अर्पित करें शिव को सुगन्धित, पुष्प फल जल द्रव्य भी।

अर्पित करें जन बिल्व के फल, पत्र  भी  शुचि हव्य भी।

नित  पूजते  अभिषेक  करते, भक्त  ले  घृत  गव्य  भी।

नित  मंदिरों  में  भीड़  होती, वस्त्र   पहने   नव्य  भी।।

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~ अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’, उज्जैन