by vijay nikore
5 hours ago
सांकल मन के द्वार पर
जब-जब जहाँ कहीं फूल खिले
तुझे याद किया था हमने ...
"क्या...
तुम्हारे मन के द्वार तक
मेरे दिल की दस्तक नहीं पहुंची ?"
दस्तक पहुँची
पहुँची हर बार
भागा, भाग कर गया
साँकल खोली
कोई था न द्वार पर
एक चिरकाल से जाने-पहचाने
अकेलेपन के सिवा
कुछ और न था
लौट आया मैं खाली हाथ
न, न, न
मुठ्ठी में लिखा नाम तो
तुम्हारा ही था
केवल तुम्हारा
जो कभी मिटने न दिया
मिटाता भी कैसे
उसको तुम्हारे आने का
इन्तज़ार जो करना था
कब से... अब तक
तो इस बार जो मैं साँकल खोलूँ
तो आना, द्वार पर
केवल तुम ही होना
--------
( यह कविता कवियत्रि प्रिया शर्मा जी की रचना से प्रेरित)
(मौलिक व अप्रकाशित)
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सांकल मन के द्वार पर
by vijay nikore
5 hours ago
सांकल मन के द्वार पर
जब-जब जहाँ कहीं फूल खिले
तुझे याद किया था हमने ...
"क्या...
तुम्हारे मन के द्वार तक
मेरे दिल की दस्तक नहीं पहुंची ?"
दस्तक पहुँची
पहुँची हर बार
भागा, भाग कर गया
साँकल खोली
कोई था न द्वार पर
एक चिरकाल से जाने-पहचाने
अकेलेपन के सिवा
कुछ और न था
लौट आया मैं खाली हाथ
न, न, न
मुठ्ठी में लिखा नाम तो
तुम्हारा ही था
केवल तुम्हारा
जो कभी मिटने न दिया
मिटाता भी कैसे
उसको तुम्हारे आने का
इन्तज़ार जो करना था
कब से... अब तक
तो इस बार जो मैं साँकल खोलूँ
तो आना, द्वार पर
केवल तुम ही होना
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( यह कविता कवियत्रि प्रिया शर्मा जी की रचना से प्रेरित)
(मौलिक व अप्रकाशित)