बरसात
घन गरजे अंधियारी छाई,
बिजली अम्बर पर इठलाई
बूँदें टपकी टप-टप भाई
रिमझिम रिमझिम बारिश आई
पत्ते खड़के भीगे लरजे
चिड़िया सहमी बादल गरजे,
कुत्ते दुबके गैया भागी
इक नन्हीं सी गुड़िया जागी
सुनकर उसकी तेज रुलाई
रिमझिम रिमझिम बारिश आई
सड़कों से बह निकला पानी
राहगीरों ने छतरी तानी,
छप-छप करते कदम बढ़ाते
ठोकर खाते गिरते जाते
बूँदें ले आयीं कठिनाई
रिमझिम-रिमझिम बारिश आई
बनकर वैद्य टटोले नाड़ी
गड्ढ़े में जा बैठी गाड़ी
उफनाया है सूखा नाला
फूट गया जो बाँधा पाला
हर छोटी नाली उफनाई
रिमझिम-रिमझिम बारिश आई।
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मौलिक/ अप्रकाशित.
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
आदरणीय अशोक भाईजी, कितनी निष्कपट, कितनी भोली, कितनी सरस कविता हुई है ! जैसे, कोई अबोध बच्चा अपनी नन्हीं-नन्हीं विस्फारित आँखों से बरसात की अनवरत बनी झड़ियों में आस-पास के गतिविधियों को, स्नात, तृप्त, उत्फुल्ल वातावरण को बूझने का प्रयास रहा है. वातावरण भी ऐसा कि असहज हो रही चर्या भी कष्ट का कारण हो तो हो, दुःख का कारण नहीं होती. तभी तो-
बूँदें ले आयीं कठिनाई
रिमझिम-रिमझिम बारिश आई
ऐसी निर्मल कविताएँ पाठक के मर्म की निष्कलुष पिपासा को तुष्ट करती हैं
शुभातिशुभ
Jul 10