चौपाइयाँ

*दोहा*

बरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।

दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।।

*चौपाई*

वह फुहार वह साथ तुम्हारा। हरपल था सुरभित अति प्यारा।।

मन   साजन  यह  कैसे  भूले। साथ-साथ   तुम  हम  थे   झूले।।

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तुम   थे  झूले   थाम   कलाई। मैं   साजन   कितनी  शरमाई।।

तुम  जब-जब  थे  पींग बढ़ाते। हम   इक  दूजे  में   खो  जाते।।

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झुकीं-झुकीं  मेरी  ये  अँखियाँ। देख रहीं थीं हँस-हँस  सखियाँ।।

पर  साजन  तुम  रुके न माने। मिले  मुझे  सखियों   से   ताने।।

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भूल  न  पाई  वह  पल प्यारे। स्वप्न   सरीखे   हैं   वह   सारे।।

आने  को  है  फिर  अब सावन। लेकिन पास नहीं तुम साजन।।

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~ अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’, उज्जैन.