दोहा सप्तक. . . . . मंच
अभिनय करते मंच पर, माटी के किरदार ।
जीवन की अनुभूतियाँ, करते वो साकार ।।
यह जग तो वह मंच है, जिसमें रंग अनेक ।
कहीं कहकहे गूँजते, कही दर्द अतिरेक ।।
निश्चित सबको छोड़ना, जीवन का यह मंच ।
पर्दा गिरते ही मिटें , झूठे सभी प्रपंच ।।
आदि - अन्त के मध्य को, मंच करे साकार ।
इस जीवन के सत्य को, कहते हैं संसार ।।
आया जो इस मंच पर, गूँजे उसका नाम ।
हुआ अँधेरा बोलता , किरदारों का काम ।।
करे उजागर मंच पर, सच को हर किरदार ।
हरदम होती अंत में, सदा झूठ की हार ।।
मंच आइना वक्त का, जिसमें चलता काल ।
विधना के इस मंच का, अम्बर बड़ा विशाल ।।
सुशील सरना / 30-5-26
बड़ी मुसीबत हो गई, सब के सब विद्वान ।
अपने से कमतर लगे, हर ज्ञानी का ज्ञान ।।
कौन सगा संसार में, सबके मन में भेद ।
करते सब विश्वास के, पेंदे में सौ छेद ।।
सुशील सरना / 30-5-26
मौलिक एवं अप्रकाशित
Sushil Sarna
आदरणीय अशोक रक्ताले जी सृजन के भावों को आत्मीय मान से अलंकृत करने का दिल से आभार आदरणीय जी
on Thursday
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
संसार का मंच एक गंभीर विषय है. तदनुरूप आपका प्रयास श्लाघनीय है, आदरणीय सुशील सरना जी.
कई दोहे तो एकदम से चकित कर दे रहे हैं -
यह जग तो वह मंच है, जिसमें रंग अनेक ।
कहीं कहकहे गूँजते, कही दर्द अतिरेक ।।
आदि - अन्त के मध्य को, मंच करे साकार ।
इस जीवन के सत्य को, कहते हैं संसार ।।
कौन सगा संसार में, सबके मन में भेद ।
करते सब विश्वास के, पेंदे में सौ छेद ।।
हार्दिक बधाइयाँ
on Friday
Sushil Sarna
on Friday