by रोहित डोबरियाल "मल्हार"
yesterday
एक हो दास्तां तो सुनाएं,
लंबी है कहानी, फिर कभी।
मिले थे जिस जगह इक उम्र पहले,
वो धुंधली सी निशानी, फिर कभी।
अभी तो ज़ख्म ही ताज़ा बहुत हैं,
वो यादों की ज़बानी, फिर कभी।
अकेलेपन से दोस्ती कर ली है मैंने,
तुम्हारी मेहरबानी, फिर कभी।
मिरी जुनूँ की दीवानी न देखी तुमने,
वहशतों का ये मंज़र, फिर कभी।
लबों पर ठहरी है बात जो अब तलक,
वही बे-ज़ुबानी, फिर कभी।
ख़लाओं में जो ढूँढती है तुम्हें,
हमारी हैरानी, फिर कभी।
मशक़्क़त बहुत है संभलने में अब,
ये सब परेशानी, फिर कभी।
अभी सो गए हैं सभी ख़्वाब ही,
नई इक कहानी, फिर कभी।
-मल्हार 'मौलिक और अप्रकाशित'
Cancel
दास्तां
by रोहित डोबरियाल "मल्हार"
yesterday
एक हो दास्तां तो सुनाएं,
लंबी है कहानी, फिर कभी।
मिले थे जिस जगह इक उम्र पहले,
वो धुंधली सी निशानी, फिर कभी।
अभी तो ज़ख्म ही ताज़ा बहुत हैं,
वो यादों की ज़बानी, फिर कभी।
अकेलेपन से दोस्ती कर ली है मैंने,
तुम्हारी मेहरबानी, फिर कभी।
मिरी जुनूँ की दीवानी न देखी तुमने,
वहशतों का ये मंज़र, फिर कभी।
लबों पर ठहरी है बात जो अब तलक,
वही बे-ज़ुबानी, फिर कभी।
ख़लाओं में जो ढूँढती है तुम्हें,
हमारी हैरानी, फिर कभी।
मशक़्क़त बहुत है संभलने में अब,
ये सब परेशानी, फिर कभी।
अभी सो गए हैं सभी ख़्वाब ही,
नई इक कहानी, फिर कभी।
-मल्हार
'मौलिक और अप्रकाशित'