by Awanish Dhar Dvivedi
on Tuesday
माँ यह शब्द नहींं केवल
इस जग की माँ से काया है। हम सबकी खातिर अतिपावन माँ के आँचल की छाया है।१।
माँ यह विषय अलौकिक है परब्रह्म जीव के जैसा ही। माँ इस सृष्टि की अनुपम है कारक ईश्वर है ऐसा ही।२।
माता बच्चों की होती है पालक सर्जक शुभ सुखराशी। माँ की गोदी में पलते हैं अज विष्णु ईश प्रभु अघनाशी ।३।
हैं शास्त्र सदा से ही कहते माँ की पद्वी सर्वोत्तम है। माँ का स्नेहामृत पाने को जग में आते पुरुषोत्तम हैं।४।
हैं कभी राम बलराम रूपधर कृष्ण कन्हाई बन जाते। माता की दिव्य अलौकिकता पाकर परमेश्वर हर्षाते ।५।
माँ के गुण गौरव को शास्वत श्रीराम कृष्ण नानक गाते। जननी जन्मभूमि पावन श्री रामचन्द्र प्रभु बतालाते।६।
माँ की वत्सलता पाने को चोरी कर कर माखन खाते। माता का स्नेह निरन्तर हो नित नया कांड कर घर आते।७।
माँ की वत्सलता पाने को प्रभु ऊलूखल में बंध जाते। हैं जग के जो पालन हारे माँ माँ कह करके चिल्लाते।८।
माँ को हम सब दे सकते क्या माँ की सेवा नित करना है। माँ की छाया नित बनी रहे सर्वोत्तम कर्म को वरना है।९।
माँ यह विषय गभीर अमिट सागर से जननी अधिकाई। माता का पावन स्नेह मिले जग में प्यारी है बस माई।१०।
माता की धैर्य धरा से ही जग का पालन पोषण होता । मॉं दुःख सभी सह लेती है सन्तति का दुःख दु:सह होता।११।
माँ खुद को भूल भाव से ही निज सन्तति की सुध लेती है। माता की स्नेहसुधा करुणा नित अविरल पावन होती है।१२।
हम सबको भी माता ने ही अतिकष्ट सहन कर तार दिया। था अति अभाव सद्भाव सिखाकर माता ने उद्धार किया।१३।
शिक्षा के हेतु ममत्व त्यागकर माँ ने दूर पठाया था। हो चूर चूर पर धैर्य धरी माँ ने ही हमें बढ़ाया था।१४।
हम सब पढ़ लिखकर सक्षम हैं बस माँ की कमी खटकती है। माँ तुमको करके याद सदा हम सबकी सांस अटकती है ।१५।
मौलिक एवं अप्रकाशी
डॉ०अवनीशधरद्विवेदी ०९!०५/२०२६
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माँ
by Awanish Dhar Dvivedi
on Tuesday
माँ यह शब्द नहींं केवल
इस जग की माँ से काया है।
हम सबकी खातिर अतिपावन
माँ के आँचल की छाया है।१।
माँ यह विषय अलौकिक है
परब्रह्म जीव के जैसा ही।
माँ इस सृष्टि की अनुपम है
कारक ईश्वर है ऐसा ही।२।
माता बच्चों की होती है
पालक सर्जक शुभ सुखराशी।
माँ की गोदी में पलते हैं
अज विष्णु ईश प्रभु अघनाशी ।३।
हैं शास्त्र सदा से ही कहते
माँ की पद्वी सर्वोत्तम है।
माँ का स्नेहामृत पाने को
जग में आते पुरुषोत्तम हैं।४।
हैं कभी राम बलराम रूपधर
कृष्ण कन्हाई बन जाते।
माता की दिव्य अलौकिकता
पाकर परमेश्वर हर्षाते ।५।
माँ के गुण गौरव को शास्वत
श्रीराम कृष्ण नानक गाते।
जननी जन्मभूमि पावन
श्री रामचन्द्र प्रभु बतालाते।६।
माँ की वत्सलता पाने को
चोरी कर कर माखन खाते।
माता का स्नेह निरन्तर हो
नित नया कांड कर घर आते।७।
माँ की वत्सलता पाने को
प्रभु ऊलूखल में बंध जाते।
हैं जग के जो पालन हारे
माँ माँ कह करके चिल्लाते।८।
माँ को हम सब दे सकते क्या
माँ की सेवा नित करना है।
माँ की छाया नित बनी रहे
सर्वोत्तम कर्म को वरना है।९।
माँ यह विषय गभीर अमिट
सागर से जननी अधिकाई।
माता का पावन स्नेह मिले
जग में प्यारी है बस माई।१०।
माता की धैर्य धरा से ही
जग का पालन पोषण होता ।
मॉं दुःख सभी सह लेती है
सन्तति का दुःख दु:सह होता।११।
माँ खुद को भूल भाव से ही
निज सन्तति की सुध लेती है।
माता की स्नेहसुधा करुणा नित
अविरल पावन होती है।१२।
हम सबको भी माता ने ही
अतिकष्ट सहन कर तार दिया।
था अति अभाव सद्भाव सिखाकर
माता ने उद्धार किया।१३।
शिक्षा के हेतु ममत्व त्यागकर
माँ ने दूर पठाया था।
हो चूर चूर पर धैर्य धरी
माँ ने ही हमें बढ़ाया था।१४।
हम सब पढ़ लिखकर सक्षम हैं
बस माँ की कमी खटकती है।
माँ तुमको करके याद सदा
हम सबकी सांस अटकती है ।१५।
मौलिक एवं अप्रकाशी
डॉ०अवनीशधरद्विवेदी
०९!०५/२०२६