गन्ने की खोई

पाँच सालों की उम्र,

एक लोहे के कोल्हू में दबी हुई है।

दो चमकदार धूर्त पत्थर (आंखें) हमें घुमा रहे हैं,

और हम... जो खेतों से कटकर आ रहे हैं।

वे हमारे 'अधिकार' नहीं निचोड़ते,

वे हमारे भीतर कहीं आत्मा तक निचोड़ते हैं।

पहले वे मीठी बातें करते हैं, जैसे शक्कर की चाशनी,

फिर हमें परतों में दबाकर,

हमारा 'रक्त' मत पेटियों (ईवीएम) के गिलास में भर लेते हैं।

जब चुनावी कोल्हू रुकता है,

तब हम इंसान नहीं बचते...

हम बस एक सूखा हुआ, बेजान 'रेशा' (खोई) रह जाते हैं।

जिसे सड़क के किनारे फेंक दिया जाता है,

और गुज़रने वाले किसी 'नये माननीय' की गाड़ी,

हम पर से फिसलती हुई गुज़र जाती है।

अजीब है ये कोल्हू जो हमारे 

रस (मेहनत और वोट) की एक-एक बूंद से 

‘माननीयों’ का शरबत बनाती है,

और हमारे हिस्से में बस...

धूप में सूखती हुई अपनी ही खाल

आती है। 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

आशीष यादव 


  • सदस्य टीम प्रबंधन

    Saurabh Pandey

    आदरणीय आशीष जी, 

    आपकी कविता आमजन की अस्मिता की उधेड़बुन को शाब्दिक करती हुई है. कि, आखिर वह है क्या? तंत्र और प्रशासनिक-व्यवस्था की चाक पर उसकी चेतना रोज पिसती है.

    बधाई .. 

     

    लेकिन इस भाव को शाब्दिक करने में लाक्षणा को साधना था. ऐसी स्थिति में निहितार्थ कोष्ठक में न देने पड़ते. इससे रचना अखबारी रपट का पद्य प्रारूप तो बन ही जाती है, रचना की कविता भी नहीं रह पाती. कविता बने रहने के लिए निहितार्थ को मुखर होने दें. किन्तु, संप्रेषण अभिधात्मक न रहे. कविता के कथ्य इंगितों में ही प्रभावी होते हैं. 

    शुभ-शुभ