प्यार का पतझड़

एक दूसरे में आश्रय खोजते भावनात्मक अवरोधों के दबाव में कभी ऐसा भी तो होता है ... समय समय से रूठ जाता है प्यार रूठता नहीं प्यार सूख जाता है वह पहचाना नहीं जाता तब पतझड़ में पत्तों की तरह पीला, सूखा ... कुम्लाहया एक असहनीय दर्द शब्द गले में अटके अधरों तक आए, भारी और भारी कुछ भी कहने में असमर्थ रिश्ते के मुड़े पन्नों पर कुछ आँसू बह-बह जाती है शब्दों की स्याही व्यथा का मूल स्रोत खोजती कितनी तीव्र कुण्ठाओं से जूझते वह बिखरे भीगे पन्ने पलटते इस पीली शाम मैं बैठा सोचता हूँ कहीं तो किस-किस नक्षत्र में कल रात ज़रूर कुछ अमंगल गुज़रा ही होगा तभी तो असीम गहरी सतह पर प्यार के गालों पर आज इतने ज़ोर का तमाचा लगा है ---- -- विजय निकोर (मौलिक व अप्रकाशित)