गर्भनाल कब कट पाती है किसी की

कहीं भी कोई भी माँ
अमर तो नहीं होती
एक दिन जाना होता ही है सब की माताओ को
फिर भी
जानते बूझते भी मन को ये क्या हो जाता है
पता नहीं किसी को फर्क पड़ता है या नहीं
पर बेटी के लिए बहुत बहुत पड़ जाता है
अचानक बड़ी हो जाती है वो
समझाने लग ज़ाती है स्वंय को

माँ के होते जिस घर आँगन
गली चौबारे में चहक लेती थी वो
उस आँचल की खुशबू से
महक महक लेती थी वो
अचानक सब कुछ बदल जाता है
अचानक उसे कुछ हो जाता है
हाथ से रेत जैसा कुछ फिसल जाता है

वही दर वही दीवार वही आँगन
फिर भी घर वो घर रह ही नहीं जाता
रह जाता है कुछ तो बस
कलेजे में खालीपन एक गहरी टीस

बिस्तर का कोना भर घेरी कमज़ोर कृशकाय माँ के जाते
उभर आता है ऐसा वृहद शून्य रिक्त -स्थान
जिसे फिर कुछ भी कभी भी भर नहीं पाता

माँ का जाना
जाने कैसा होता है ये जाना
कि कुछ समझ ही नहीं आता
गर्भनाल कब कट पायी है किसी की
मौलिक व अप्रकाशित