कहीं भी कोई भी माँ अमर तो नहीं होती एक दिन जाना होता ही है सब की माताओ को फिर भी जानते बूझते भी मन को ये क्या हो जाता है
पता नहीं किसी को फर्क पड़ता है या नहीं पर बेटी के लिए बहुत बहुत पड़ जाता है अचानक बड़ी हो जाती है वो समझाने लग ज़ाती है स्वंय को
माँ के होते जिस घर आँगन गली चौबारे में चहक लेती थी वो उस आँचल की खुशबू से महक महक लेती थी वो अचानक सब कुछ बदल जाता है अचानक उसे कुछ हो जाता है हाथ से रेत जैसा कुछ फिसल जाता है
वही दर वही दीवार वही आँगन फिर भी घर वो घर रह ही नहीं जाता रह जाता है कुछ तो बस कलेजे में खालीपन एक गहरी टीस
बिस्तर का कोना भर घेरी कमज़ोर कृशकाय माँ के जाते उभर आता है ऐसा वृहद शून्य रिक्त -स्थान जिसे फिर कुछ भी कभी भी भर नहीं पाता
माँ का जाना जाने कैसा होता है ये जाना कि कुछ समझ ही नहीं आता गर्भनाल कब कट पायी है किसी की
एक मार्मिक भावदशा को शाब्दिक करने का सार्थक प्रयास हुआ है, आदरणीया अमिता तिवारीजी. आप सतत अभ्यासरत रहें.
प्रस्तुत पंक्तियों में रीढ़ को जमा देने की सच्चाई है -
बिस्तर का कोना भर घेरी कमज़ोर कृशकाय माँ के जाते उभर आता है ऐसा वृहद शून्य रिक्त -स्थान जिसे फिर कुछ भी कभी भी भर नहीं पाता ..........
फिर, माँ के दिवंगत होते ही एक बेटी की पारिवारिक दशा को अत्यंत ही भावभरे शब्दों में स्पष्ट किया गया है -
माँ के होते जिस घर आँगन गली चौबारे में चहक लेती थी वो उस आँचल की खुशबू से महक महक लेती थी वो अचानक सब कुछ बदल जाता है अचानक उसे कुछ हो जाता है हाथ से रेत जैसा कुछ फिसल जाता है
इस प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई, आदरणीया अमिताजी
ओबीओ की वर्तमान परिस्थितियों के मद्देनजर आपकी भावमय रचना भावुक कर रही है.
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
एक मार्मिक भावदशा को शाब्दिक करने का सार्थक प्रयास हुआ है, आदरणीया अमिता तिवारीजी. आप सतत अभ्यासरत रहें.
प्रस्तुत पंक्तियों में रीढ़ को जमा देने की सच्चाई है -
बिस्तर का कोना भर घेरी कमज़ोर कृशकाय माँ के जाते
उभर आता है ऐसा वृहद शून्य रिक्त -स्थान
जिसे फिर कुछ भी कभी भी भर नहीं पाता ..........
फिर, माँ के दिवंगत होते ही एक बेटी की पारिवारिक दशा को अत्यंत ही भावभरे शब्दों में स्पष्ट किया गया है -
माँ के होते जिस घर आँगन
गली चौबारे में चहक लेती थी वो
उस आँचल की खुशबू से
महक महक लेती थी वो
अचानक सब कुछ बदल जाता है
अचानक उसे कुछ हो जाता है
हाथ से रेत जैसा कुछ फिसल जाता है
इस प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई, आदरणीया अमिताजी
ओबीओ की वर्तमान परिस्थितियों के मद्देनजर आपकी भावमय रचना भावुक कर रही है.
शुभातिशुभ
May 6
आशीष यादव
एक भावपूर्ण मर्मस्पर्शी कविता पर आपको बधाई।
आदरणीय Saurabh Pandey जी की टिप्पणी ही इस कविता की ऊँचाई को बयां करने के लिए बहुत है
May 11
amita tiwari
मान्य,सौरभ पांडे जीआशीष यादव जी , ,
ह्रदय से आभारी हूँ. स्नेह बनाए रखियगा |
सौरभ जी ने एक बेटी के मर्म की थाह को नाप लिया |आभार.|
May 14