कहीं भी कोई भी माँ अमर तो नहीं होती एक दिन जाना होता ही है सब की माताओ को फिर भी जानते बूझते भी मन को ये क्या हो जाता है
पता नहीं किसी को फर्क पड़ता है या नहीं पर बेटी के लिए बहुत बहुत पड़ जाता है अचानक बड़ी हो जाती है वो समझाने लग ज़ाती है स्वंय को
माँ के होते जिस घर आँगन गली चौबारे में चहक लेती थी वो उस आँचल की खुशबू से महक महक लेती थी वो अचानक सब कुछ बदल जाता है अचानक उसे कुछ हो जाता है हाथ से रेत जैसा कुछ फिसल जाता है
वही दर वही दीवार वही आँगन फिर भी घर वो घर रह ही नहीं जाता रह जाता है कुछ तो बस कलेजे में खालीपन एक गहरी टीस
बिस्तर का कोना भर घेरी कमज़ोर कृशकाय माँ के जाते उभर आता है ऐसा वृहद शून्य रिक्त -स्थान जिसे फिर कुछ भी कभी भी भर नहीं पाता
माँ का जाना जाने कैसा होता है ये जाना कि कुछ समझ ही नहीं आता गर्भनाल कब कट पायी है किसी की
गर्भनाल कब कट पाती है किसी की
by amita tiwari
11 hours ago
अमर तो नहीं होती
एक दिन जाना होता ही है सब की माताओ को
फिर भी
जानते बूझते भी मन को ये क्या हो जाता है
पर बेटी के लिए बहुत बहुत पड़ जाता है
अचानक बड़ी हो जाती है वो
समझाने लग ज़ाती है स्वंय को
माँ के होते जिस घर आँगन
गली चौबारे में चहक लेती थी वो
उस आँचल की खुशबू से
महक महक लेती थी वो
अचानक सब कुछ बदल जाता है
अचानक उसे कुछ हो जाता है
हाथ से रेत जैसा कुछ फिसल जाता है
वही दर वही दीवार वही आँगन
फिर भी घर वो घर रह ही नहीं जाता
रह जाता है कुछ तो बस
कलेजे में खालीपन एक गहरी टीस
बिस्तर का कोना भर घेरी कमज़ोर कृशकाय माँ के जाते
उभर आता है ऐसा वृहद शून्य रिक्त -स्थान
जिसे फिर कुछ भी कभी भी भर नहीं पाता
माँ का जाना
जाने कैसा होता है ये जाना
कि कुछ समझ ही नहीं आता
गर्भनाल कब कट पायी है किसी की