प्यादे— बेकसूर, बेख़बर, नियति और नीति से अनजान— अक्सर मान लिये जाते हैं मात्र एक संख्या भर।
तैनात कर दिये जाते हैं महाराज-महारानी के गिर्द रक्षा-कवच बनकर, और उसी क्षण उनकी पहचान सिमट जाती है— एक संख्या भर।
वे मात खाते हैं, कभी मात दिलाते भी हैं, गिरते हैं, उठते हैं, और फिर गिरा दिये जाते हैं— इतनी सहजता से कि किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता।
इतिहास दर्ज नहीं करता प्यादे के पाँव का रुदन, यादों के गाँव के छाले, चालों के चक्रव्यूह में घिसते, रिसते घाव।
इतिहास उन पर ठहरता तक नहीं।
इतिहास लिखता है— पराजित महाराज की कथा, विजयी महारानी की गाथा; और विस्मृत हो जाती है प्यादों की व्यथा। उनकी कोई कथा नहीं, जैसे उनका होना ही एक संख्या भर हो।
पर क्या कभी ऐसा होगा— कि यही प्यादे अंगद का पाँव बन जाएँ, और बिसात ही हिल उठे?
जब संख्या भर समझे गये लोग अपना मान पहचान लेंगे— तब ताज की औक़ात और खेल की बिसात दोनों बदल जाएँगे।
—अमिता तिवारी
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मौलिक व अप्रकाशित
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
आदरणीय अमिताजी, हार्दिक बधाइयाँ
प्रस्तुति में रचनात्मकता के साथ-साथ इसके प्रस्तुतीकरण में नवाचार भी है. एक प्यादे की पारिस्थिक दशा के माध्यम से समाज के एक अदने से व्यक्ति की उपयोगिता को स्थापित करने का प्रयास हुआ है. यह कथित दबे-कुचलों की महत्ता को रेखांकित करने का सुगढ़ प्रयास है.
आपके रचनाकर्म में नैरंतर्य व्यापे.
शुभातिशुभ
May 6
amita tiwari
मान्यवर सौरभ पांडे जी ,
सार्थक और विस्तृत टिप्पणी के लिए आभार.
May 11