बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें

बहुत सोचती हैं क्यों ये औरतें


बेगुनाही और
इन्साफ की
बात क्यों सोचती हैं ये औरतें
चुपचाप अहिल्या बन क्यों नहीं जातीं  ?

अस्मिता और
सवाल उठाने की
बात क्यों सोचती हैं ये औरतें
चुपचाप द्रौपदी बन क्यों नहीं जातीं  ?
अंधे ताज और
विवेक तर्क की
बात क्यों सोचती हैं ये औरतें
चुपचाप गांधारी बन क्यों नहीं जातीं ?

कर्तव्य और
मर्यादा सम्बन्ध की
बात क्यों सोचती हैं ये औरतें
चुपचाप जानकी बन क्यों नहीं जातीं  ?

प्रतिशत और
संख्या सवालों की
बात क्यों सोचती हैं ये औरतें
चुपचाप आरक्षित बन  क्यों नहीं जातीं ?

मौलिक व अप्रकाशित"


  • सदस्य टीम प्रबंधन

    Saurabh Pandey

    आदरणीया अमिताजी, तार्किकता को शाब्दिक कर तटस्थ सवालों की तर्ज में बाँधा जाना प्रस्तुति को रुचिकर बना रहा है. 

    हर बंद में जाती वस्तुतः जातीं होना चाहिए. कि,आपने औरतें का प्रयोग किया है, जो बहुवचन संज्ञा है. 

    जानकी वम क्यों नहीं जाती... के स्थान् अपर जानकी बन क्यों नहीं जातीं  होना चाहिए. 

    शुभ-शुभ