माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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पीछे गयी  है  छूट  जो  होली  गुलाल की
साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१।
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कहने को  आयी  देश  में  इक्कीसवीं सदी
होली पे भाँग चढ़ती है फिर भी खयाल की।२।
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कहने को पर्व  रंग  का, मस्ती मजाक का
पड़ती मगर है इस पे भी छाया बवाल की।३।
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रति के बदलते भाव ने बदली कशिश तभी
साजन को देख बढ़ती न रंगत वो गाल की।४।
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माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े
टेढ़ी करो न  रोष  में  रेखा को भाल की।५।
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होली में अब  न  शेष  हैं  रंगो-गुलाल वो
कर दी सभी ने आज ये रंजो मलाल की।६।
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मजहब की बात छोड़ के खेलोगे रंग जो
लगने लगेगी आप को होली कमाल की।७।
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रंगों ने साथ देह  के  मन भी रँगा है आज
होली रहेगी याद 'मुसाफिर' इस साल की।८।
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मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
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