पीछे गयी है छूट जो होली गुलाल की साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१। * कहने को आयी देश में इक्कीसवीं सदी होली पे भाँग चढ़ती है फिर भी खयाल की।२। * कहने को पर्व रंग का, मस्ती मजाक का पड़ती मगर है इस पे भी छाया बवाल की।३। * रति के बदलते भाव ने बदली कशिश तभी साजन को देख बढ़ती न रंगत वो गाल की।४। * माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े टेढ़ी करो न रोष में रेखा को भाल की।५। * होली में अब न शेष हैं रंगो-गुलाल वो कर दी सभी ने आज ये रंजो मलाल की।६। * मजहब की बात छोड़ के खेलोगे रंग जो लगने लगेगी आप को होली कमाल की।७। * रंगों ने साथ देह के मन भी रँगा है आज होली रहेगी याद 'मुसाफिर' इस साल की।८। ** मौलिक/अप्रकाशित लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' *
माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े -लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
on Tuesday
२२१/२१२१/१२२१/२१२
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पीछे गयी है छूट जो होली गुलाल की
साजिश है इसमें देख सियासी कपाल की।१।
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कहने को आयी देश में इक्कीसवीं सदी
होली पे भाँग चढ़ती है फिर भी खयाल की।२।
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कहने को पर्व रंग का, मस्ती मजाक का
पड़ती मगर है इस पे भी छाया बवाल की।३।
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रति के बदलते भाव ने बदली कशिश तभी
साजन को देख बढ़ती न रंगत वो गाल की।४।
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माना कि रंग भाते न फिर भी अगर पड़े
टेढ़ी करो न रोष में रेखा को भाल की।५।
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होली में अब न शेष हैं रंगो-गुलाल वो
कर दी सभी ने आज ये रंजो मलाल की।६।
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मजहब की बात छोड़ के खेलोगे रंग जो
लगने लगेगी आप को होली कमाल की।७।
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रंगों ने साथ देह के मन भी रँगा है आज
होली रहेगी याद 'मुसाफिर' इस साल की।८।
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मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
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