दोहा पंचक. . . . .अधर

दोहा पंचक. . . . . अधर

अधरों को अभिसार का, मत देना  इल्जाम ।
मनुहारों के दौर में, शाम हुई बदनाम ।।

उन्मादी आवेग में , कब कुछ रहता ध्यान ।
अधरों की शैतानियाँ, कहते सुर्ख निशान ।।

अधरों ने की दिल्लगी, अधरों से कल शाम ।
जज्बातों के वेग में, बंध हुए बदनाम ।।

अधर समागम जब हुआ, खूब हुआ संग्राम ।
स्पर्शों के दौर में , बिखर गये सब जाम ।।

अधर दलों पर डोलता, जब दिल का ईमान ।
बेशर्मी के पार सब, दिल करता सोपान ।।

सुशील सरना / 17-3-25

मौलिक एवं अप्रकाशित