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निर्वाण नहीं हीं चाहिए
by
amita tiwari
on Monday
निर्वाण नहीं हीं चाहिए
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कैसा लगता होगा
ऊपर से देखते होंगे जब
माँ -बाबा
कि जिस
मुकाम मकान दुकान
खानदान के नाम को
कमाने में
सारी उम्र लगाई
पाई पाई बचाई
खुली खुशी
संतति को थमाई
संग में
थमा दिए
विरासत से मिले
सारे उपहार
संस्कार
तीज त्यौहार
ज़मीन व्यापार
रात दिन
सप्ताह साल
सपनो के घरौदे सब घरबार
वही घर वही बार
उसकी वही बाराह्दरी
वही आस्था गढ़ी
दर्जनों फीट ऊंची वही दीवार
उस पर टंगी उन की
महज कुछ इंच की चौकोर
आम सी तस्वीर
वंश की जागीर
अचानक
हटा देता है
वही उतराधिकारी सपूत
और रख देता है
कबाड़ के लिए आरक्षित
एक खामोश कोने में
मकडी के जालों के संग
चहूं और केवल जंग और जंग
जंग लगे कबाड़ के साथ
करनी न पड़े धूल भी साफ़
यहीं तक नहीं रुकता
कर देता प्रवाहित तक कर देने की बात
कैसा गहरा लगता होगा आघात
तब
फ्रेम से झांकती
स्वर्गवासी आत्माओं को
संयोग की बात
उसी क्षण
ऊपर
आन पहुंचा होता
जन्म जन्मो से प्रतीक्षित
वो एक निर्णायक क्षण
कि
पूछते प्रभु
ठगी सी उलझन में उलझी
उपेक्षा अपमान की अग्नि में झुलसी
इन अवाक खामोश आमाओं से
चिर प्रतीक्षित प्रश्न
कि खुलने वाला है
मोक्ष प्राप्ति के लिए निर्वाण द्वार
जन्म मरण की पीड़ा से मुक्ति
युगों से अर्जित पुण्यों की शक्ति
लेकिन
निज व्यर्थता का एहसास
विरक्ति जगने नहीं दे पाता
रोम रोम आहत ,
आत्मा मर्माहत
गमन हो ही नहीं पाता
और
जन्म लेता है महाभारत
पुण्यात्माओं के मन में
ऊपर बैठे किसी
उपवन मरुस्थल या वन में
और फिर निर्णय हो जाता है
बदल जाता है
अपेक्षित उदगार
प्रतीक्षित मनवांछित निर्वाण आधार
मुक्ति के लिए पुण्यात्माएं तैयार
मांग लेटी हैं विपरीत
पुनर्जन्म
मात लोक में
उसी घर में
फिर से जन्म
कबाड़ से निकल
उसी दीवार पर
कुछ इंच की चौकोर तस्वीर के
पुनर्प्रतिष्ठा पुनर्स्थापना प्रयास हेतु
पुनर्जन्म
और
पुन
चल पड़ता है
चक्कर चौसासी का
पुनरपि जननम ,पुनरपि मरणं का
काश !तस्वीरों का निर्वासन थम जाता
मौलिक व अप्रकाशित"
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निर्वाण नहीं हीं चाहिए
by amita tiwari
on Monday