अभिसारों के वेग में, बंध हुए निर्बंध ।
मौन सभी खंडित हुए, शेष रही मधुगंध ।।
प्रेम लोक की कल्पना, जब होती साकार ।
काबू में कैसे रहे, मौन मिलन संसार ।।
अधरों की मनुहार का, अधर करें अनुवाद ।
शेष कपोलों पर रहे, वेगवान उन्माद ।।
अभिसारों की आँधियाँ, अधरों के उत्पात ।
कैसी बीती क्या कहें, मदन वेग की रात ।।
बातें बीती रात की, कहते आए लाज ।
लाख छुपाया खुल गए, सुर्ख नयन से राज ।।
सुशील सरना / 8-2-26
मौलिक एवं अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
आ. भाई सुशील जी, सादर अभिवादन। संयोग शृंगार पर सुंदर दोहे हुए हैं। हार्दिक बधाई।
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