2122 1212 22
आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में
क्या से क्या हो गए महब्बत में
मैं ख़यालों में आ गया उस की
हो इज़ाफ़ा कहीं न दिक़्क़त में
मुझ से मुझ ही को दूर करने को
आयी तन्हाई शब ए फुर्क़त में
तुम ख़यालों में आ जाते हो यूं
चीन ज्यूँ आ गया तिब्बत में
चाट कर के अफीम मज़हब की
मरते हैं क्यूँ ग़रीब ग़फ़लत में
ए ग़रीबी है शुक्रिया तेरा
जो भी सीखा है सीखा ग़ुर्बत में
मौलिक एवं अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक बधाई।
yesterday
Jaihind Raipuri
आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला
आपकी हौसलाअफ़ज़ाई का आभारी हूँ
yesterday
Jaihind Raipuri
क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी
yesterday