दोहा पंचक. . . . रिश्ते

दोहा पंचक. . . . रिश्ते

मिलते हैं  ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।
संबंधों को निभा रहे, जैसे हो दस्तूर ।।

लगने को ऐसा लगे, जैसे सब हों साथ ।
वक्त पड़े तो छोड़ दे, खून, खून का हाथ ।।

पहले जैसे अब कहाँ, जीवन में  संबंध ।
आती है अपनत्व में , स्वार्थ भाव की गंध ।।

वाणी कर्कश हो गई, भूले करना मान ।
संबंधों को लीलता , अर्थ लिप्त अभिमान ।।

रिश्तों में माधुर्य का, वक्त गया है बीत ।
अब तो बस पहचान की ,निभा रहे हैं रीत ।।

सुशील सरना / 1-2-26

मौलिक एवं अप्रकाशित