by Sushil Sarna
12 hours ago
दोहा पंचक. . . . रिश्ते
मिलते हैं ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।संबंधों को निभा रहे, जैसे हो दस्तूर ।।
लगने को ऐसा लगे, जैसे सब हों साथ ।वक्त पड़े तो छोड़ दे, खून, खून का हाथ ।।
पहले जैसे अब कहाँ, जीवन में संबंध । आती है अपनत्व में , स्वार्थ भाव की गंध ।।
वाणी कर्कश हो गई, भूले करना मान ।संबंधों को लीलता , अर्थ लिप्त अभिमान ।।
रिश्तों में माधुर्य का, वक्त गया है बीत ।अब तो बस पहचान की ,निभा रहे हैं रीत ।।
सुशील सरना / 1-2-26
मौलिक एवं अप्रकाशित
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दोहा पंचक. . . . रिश्ते
by Sushil Sarna
12 hours ago
दोहा पंचक. . . . रिश्ते
मिलते हैं ऐसे गले , जैसे हों मजबूर ।
संबंधों को निभा रहे, जैसे हो दस्तूर ।।
लगने को ऐसा लगे, जैसे सब हों साथ ।
वक्त पड़े तो छोड़ दे, खून, खून का हाथ ।।
पहले जैसे अब कहाँ, जीवन में संबंध ।
आती है अपनत्व में , स्वार्थ भाव की गंध ।।
वाणी कर्कश हो गई, भूले करना मान ।
संबंधों को लीलता , अर्थ लिप्त अभिमान ।।
रिश्तों में माधुर्य का, वक्त गया है बीत ।
अब तो बस पहचान की ,निभा रहे हैं रीत ।।
सुशील सरना / 1-2-26
मौलिक एवं अप्रकाशित