दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिल

रात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन ।
फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन ।।

उल्फत की दहलीज पर, दिल बैठा हैरान ।
सोच रहा वह  इश्क में, क्या पाया नादान ।।

आँसू आहें हिचकियाँ, उल्फत के ईनाम ।
नींदों से ली दुश्मनी, और हुए बदनाम ।।

ख्वाबों सा हर पल लगे, उन बांहों में यार ।
जिस्मानी जन्नत मिली, दिल को मिला करार ।।

कैसी ख्वाहिश कर रहा  , पागल दिल नादान ।
आसमान सम चाँद पर, खो बैठा ईमान ।।

सुशील सरना / 4-2-26

मौलिक एवं अप्रकाशित