दोहा पंचक - आचरण

चाहे पद से हो बहुत, मनुज शक्ति का भान।
किन्तु आचरण से मिले, सदा जगत में मान।।
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हवा  विषैली  हो  गयी, रहा  नगर  या गाँव।
बिखराते नित मैल अब, जिह्वा के सौ पाँव।।
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बदनामी से  नाम  नित, जोड़़  रहे  सब मौन
धन अच्छे व्यवहार का, कमा रहा अब कौन।।
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मन रिश्तो से बढ़ करे, अब बस धन की होड़
सुख-दुख के  साथी  गये, ऐसे  पथ  में छोड़।।
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बन जाये यदि चाहता, जीवन सुन्दर तीज
सदाचार के बीज  को, बाल  मनों में बीज।।
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मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'