चाहे पद से हो बहुत, मनुज शक्ति का भान। किन्तु आचरण से मिले, सदा जगत में मान।। * हवा विषैली हो गयी, रहा नगर या गाँव। बिखराते नित मैल अब, जिह्वा के सौ पाँव।। * बदनामी से नाम नित, जोड़़ रहे सब मौन धन अच्छे व्यवहार का, कमा रहा अब कौन।। * मन रिश्तो से बढ़ करे, अब बस धन की होड़ सुख-दुख के साथी गये, ऐसे पथ में छोड़।। * बन जाये यदि चाहता, जीवन सुन्दर तीज सदाचार के बीज को, बाल मनों मेंबीज।। * मौलिक/अप्रकाशित लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
दोहा पंचक - आचरण
by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
3 hours ago
चाहे पद से हो बहुत, मनुज शक्ति का भान।
किन्तु आचरण से मिले, सदा जगत में मान।।
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हवा विषैली हो गयी, रहा नगर या गाँव।
बिखराते नित मैल अब, जिह्वा के सौ पाँव।।
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बदनामी से नाम नित, जोड़़ रहे सब मौन
धन अच्छे व्यवहार का, कमा रहा अब कौन।।
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मन रिश्तो से बढ़ करे, अब बस धन की होड़
सुख-दुख के साथी गये, ऐसे पथ में छोड़।।
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बन जाये यदि चाहता, जीवन सुन्दर तीज
सदाचार के बीज को, बाल मनों में बीज।।
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मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'