दोहा एकादश. . . . . पतंग

मकर संक्रांति के अवसर पर

दोहा एकादश   . . . . पतंग

आवारा मदमस्त सी, नभ में उड़े पतंग ।
बीच पतंगों के लगे, अद्भुत दम्भी जंग ।।

बंधी डोर से प्यार की, उड़ती मस्त पतंग ।
आसमान को चूमते, छैल-छबीले रंग ।।

कभी उलझ कर लाल से, लेती वो प्रतिशोध ।
डोर- डोर की रार का, मन्द न होता क्रोध ।।

नीले अम्बर में सजे, हर मजहब के रंग ।
जात- पात को भूलकर, अम्बर उड़े पतंग ।।

जैसे ही आकाश में, कोई कटे पतंग ।
उसे लूटने के लिए, आते कई दबंग ।।

किसी धर्म की है हरी, किसी धर्म की लाल ।
आसमान में खो गए,  ऐसे सभी सवाल ।।

सुघड़ हाथ में डोर तो, छूती  मेघ पतंग ।
गलत हाथ में जो गई, खंडित  होते अंग ।।

आसमान में जब उड़े, सुन्दर सुघड़ पतंग ।
लेकर  उड़ती साथ में, प्रेम सुवासित रंग ।।

छैल - छबीली सी उड़े, लचकें कोमल अंग ।
सीना ताने गर्व से, नभ में उड़े पतंग ।।

हिलमिल कैसे उड़ रहे, आसमान में रंग ।
मुश्किल है पहचानना , अपनी कहाँ पतंग ।।

सुशील सरना / 14-1-25

मौलिक एवं अप्रकाशित