दोहा पंचक. . . क्रोध

दोहा पंचक. . . . क्रोध

मानव हरदम क्रोध में, लेता है प्रतिशोध ।
सही गलत का फिर उसे, कब रहता है बोध ।।

बड़े भयानक क्रोध के, होते हैं परिणाम ।
बदले के अंगार को, मिलता नहीं विराम ।।

हर लेता इंसान का, क्रोधी  सदा विवेक ।
मिटते  इसके ज्वाल में, रिश्ते मधुर अनेक ।

क्रोध अनल में आदमी, कर जाता वह काम ।
घातक जिसके बाद में, अक्सर हों परिणाम ।।

पर्दे पड़ते अक्ल पर, जब  आता है क्रोध ।
दावानल में क्रोध की, बस लेता प्रतिशोध ।।

सुशील सरना /   8-1-26

मौलिक एवं अप्रकाशित 

  • Ashok Kumar Raktale

    आदरणीय सुशील सरना साहब सादर, क्रोध विषय चुनकर आपके सुन्दर दोहावली रची है. हार्दिक बधाई स्वीकारें. फिर भी तृतीय दोहा देख लें इसके द्वितीय चरण में दस मात्राएँ रह गईं हैं. क्रोध एवं ज्वाल दोनों ही शब्द पुल्लिंग हैं इसकारण तृतीय चरण में 'इसकी' के स्थान पर 'इसके' कर लेना बेहतर होगा. सादर