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नवगीत : सूर्य के दस्तक लगाना // सौरभ

सूर्य के दस्तक लगाना
देखना सोया हुआ है

व्यक्त होने की जगह
क्यों शब्द लुंठित
जिस समय जग
अर्थ ’नव’ का गोड़ता हो
कुंद होती दिख रही हो वेग की गति
और कर्कश वक्त
केंचुल छोड़ता हो

साधना जब
शौर्य का विस्तार चाहे
उग्र का पर्याय तब
खोया हुआ है

धूप के दर्शन नहीं हैं,
धुंध है बस
व्योम के उत्साह पर
कुहरा जड़ा है
जम रहा है आँख का पानी निरंतर
काल यह संक्रांति का
औंधा पड़ा है

अब प्रतीक्षा क्यों, शलाका हाथ ले लो
कोड़ दो संसार
तम बोया हुआ है
***
मौलिक और अप्रकाशित

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  • Chetan Prakash

    नव वर्ष  की संक्रांति की घड़ी में वर्तमान की संवेदनहीनता और  सोच की जड़ता पर प्रहार करता आपका यह नवगीत वास्तव  में मुझे एक प्रयाण गीत जैसा उद्बोधन करता हुआ प्रतीत हुआ जो अपने उद्देश्य पूरी तरह सफल है !इस उल्लेखनीय नवगीत हेतु आप निश्चय ही बधाई के पात्र हैं, आदरणीय भाई सौरभ जी !


  • सदस्य टीम प्रबंधन

    Saurabh Pandey

    उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय अशोक भाईजी 


  • सदस्य टीम प्रबंधन

    Saurabh Pandey

    रचना पर आपकी पाठकीय प्रतिक्रिया सुखद है, आदरणीय चेतन प्रकाश जी. 

    आपका हार्दिक धन्यवाद