ग़ज़ल
2122 2122 212
कितने काँटे कितने कंकर हो गये
हर गली जैसे सुख़नवर हो गये
रास्तों पर तीरगी है आज भी
शह्र-से जब गाँव के घर हो गये
आत्मनिर्भर हो रहे थे ही कि वे
हुक्म आया घर से बेघर हो गये
जो गिरी तो साख गिरती ही गई
अच्छे खासे नोट चिल्लर हो गये
सहमी-सहमी हर कली खिलती है अब
यूँ बड़े भँवरों के लश्कर हो गये
एक नेता और अफसर क्या हुए
कितने-कितने खेत बंजर हो गए
डोर ऐसी उसके हाथों आ गयी
उड़ते पंछी पल में बे-पर हो गये
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मौलिक/ अप्रकाशित.
अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'
आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन।बहुत सुंदर समसामयिक गजल हुई है। बहुत बहुत हार्दिक बधाई।
on Thursday
Sushil Sarna
वाहहहहहह आदरणीय क्या ग़ज़ल हुई है हर शे'र पर वाह निकलती है । दिल से मुबारकबाद कबूल फरमाएं सर
on Thursday