ग़ज़ल
2122 2122 212
कितने काँटे कितने कंकर हो गये
हर गली जैसे सुख़नवर हो गये
रास्तों पर तीरगी है आज भी
शह्र-से जब गाँव के घर हो गये
आत्मनिर्भर हो रहे थे ही कि वे
हुक्म आया घर से बेघर हो गये
जो गिरी तो साख गिरती ही गई
अच्छे खासे नोट चिल्लर हो गये
सहमी-सहमी हर कली खिलती है अब
यूँ बड़े भँवरों के लश्कर हो गये
एक नेता और अफसर क्या हुए
कितने-कितने खेत बंजर हो गए
डोर ऐसी उसके हाथों आ गयी
उड़ते पंछी पल में बे-पर हो गये
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मौलिक/ अप्रकाशित.
अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’
Ashok Kumar Raktale
आदरणीय भाई लक्षमण धामी जी सादर, प्रस्तुत ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. सादर
19 hours ago
Ashok Kumar Raktale
आदरणीय सुशील सरना साहब सादर, प्रस्तुत ग़ज़ल पर उत्साहवर्धन के लिए आपका दिल से शुक्रिया. सादर
19 hours ago
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
आदरणीय अशोक भाई, आपके प्रस्तुत प्रयास से मन मुग्ध है. मैं प्रति शे’र अपनी बात रखता हूँ
कितने काँटे कितने कंकर हो गये
हर गली जैसे सुख़नवर हो गये
बहुत ही सार्थक और प्रभावी मतला हुआ है.
वैसे, उला के प्रवाह में सानी का होना मतले को और वजनदार कर देता. इसके लिए तुर्की-ब-तुर्की कहना था - हर गली कितने सुखनवर हो गये ... ऐसा किया जाना काँटों और कंकर की श्रेणी में तमाम बेतुके सुखनवरों को रखता हुआ उनकी जगह बता देता. .
रास्तों पर तीरगी है आज भी
शह्र-से जब गाँव के घर हो गये
इस शे’र को और समय दिया जाता तो इसकी सम्प्रेषणीयता और बढ़ जाती.
जैसे
रास्तों की तीरगी के अर्थ क्या
शह्र-से जब गाँव के घर हो गये
आत्मनिर्भर हो रहे थे ही कि वे
हुक्म आया घर से बेघर हो गये
पुनर्प्रतिस्थापना के लिए बार-बार प्रयासरत परिवारों की लाचारी उभर आयी है इस शे’र के माध्यम से.
उला का विन्यास यों कर दिया जाय - आत्मनिर्भर हो रहे ही थे कि वे
जो गिरी तो साख गिरती ही गई
अच्छे खासे नोट चिल्लर हो गये
वाह-वाह ... बहुत खूब .. आज जो मुद्रास्फीति की दशा है उस लिहाज से यह शे’र मौजूँ बन पड़ा है
सहमी-सहमी हर कली खिलती है अब
यूँ बड़े भँवरों के लश्कर हो गये
वाह वाह .. भँवरों के लश्कर का तो जवाब नहीं.
एक नेता और अफसर क्या हुए
कितने-कितने खेत बंजर हो गए
यह नेता-अफसर के नेक्सस पर सशक्त कहन बन पड़ा है. बहुत खूब ..
बहरहाल, उला का विन्यास कुछ यों हो सकता था -
क्या मिले नेता तथा अफसर यहाँ
कितने-कितने खेत बंजर हो गये
डोर ऐसी उसके हाथों आ गयी
उड़ते पंछी पल में बे-पर हो गये
इस शे’र पर और समय चाहिए होगा. भाव स्पष्ट हो रहे हैं लेकिन शे’र की पकड में नहीं आ रहे.
इस सुन्दर और सुगढ़ प्रयास के लिए हार्दिक बधाई
जय-जय
9 minutes ago