बात हुई कुछ इस तरह, उनसे मेरी यार ।
सिरहाने खामोशियाँ, टूटी सौ- सौ बार ।।
मौसम की मनुहार फिर, शीत हुई उद्दंड ।
मिलन ज्वाल के वेग में, ठिठुरन हुई प्रचंड ।
मौसम आया शीत का, मचल उठे जज्बात ।
कैसे बीती क्या कहें, मदन वेग की रात ।।
स्पर्शों की आँधियाँ, उस पर शीत अलाव ।
काबू में कैसे रहे, मौन मिलन का भाव ।।
आँखों -आँखों में हुए, मधुर मिलन संवाद ।
संवादों के फिर किए , अधरों ने अनुवाद ।।
सुशील सरना / 16-11-25
मौलिक एवं अप्रकाशित
सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey
बात हुई कुछ इस तरह, उनसे मेरी यार ।
सिरहाने खामोशियाँ, टूटी सौ- सौ बार ।। ............ क्या ही शाब्दिक दृश्य रचा गया है
मौसम की मनुहार फिर, शीत हुई उद्दंड । ........ मौसम की मनुहार पर,
मिलन ज्वाल के वेग में, ठिठुरन हुई प्रचंड । .........
मौसम आया शीत का, मचल उठे जज्बात ।
कैसे बीती क्या कहें, मदन वेग की रात ।। ........... मदन पगी कल रात
स्पर्शों की आँधियाँ, उस पर शीत अलाव । ......... प्रथम चरण में मात्रा-गणना देख लें. हिन्दी में स्पर्शों को इस्पर्शों की तरह नहीं गिना जा सकता.
काबू में कैसे रहे, मौन मिलन का भाव ।। ........ मौन मिलन के भाव
आँखों -आँखों में हुए, मधुर मिलन संवाद ।
संवादों के फिर किए , अधरों ने अनुवाद ।। ......... वाह .. क्या बात है..
आदरणीय सुशील सरना जी, आपकी प्रस्तुति का धन्यवाद और हार्दिक बधाइयाँ
on Monday