दोहा पंचक. . . शृंगार

 

बात हुई कुछ इस तरह,  उनसे मेरी यार ।
सिरहाने खामोशियाँ, टूटी सौ- सौ बार ।।

 

मौसम की मनुहार फिर, शीत हुई उद्दंड ।
मिलन ज्वाल के वेग में, ठिठुरन हुई प्रचंड ।

 

मौसम  आया शीत का, मचल उठे जज्बात ।
कैसे बीती क्या कहें, मदन वेग की रात ।।

 

स्पर्शों की आँधियाँ, उस पर शीत अलाव ।
काबू में कैसे रहे, मौन मिलन का भाव ।।

 

आँखों -आँखों में हुए, मधुर मिलन संवाद ।
संवादों के फिर किए , अधरों ने अनुवाद ।।

 

सुशील सरना / 16-11-25

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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  • Sushil Sarna

    आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी सृजन पर आपकी समीक्षात्मक प्रतिक्रिया का दिल से आभार । स्पर्शों में स्वर  इस्पर्शों का आता है अब दोहा स्वर  आधारित है तो इस्पर्शों किया है ।


  • सदस्य टीम प्रबंधन

    Saurabh Pandey

    किसने कहा छंद स्वर आधारित 'ही' हैं। तब तो शब्दों के अशुद्ध उच्चारण करने वाले छांदसिक पंक्तियों की मात्राओं की गणना का सत्यानाश कर बैठेंगे। हिंदी वाचिक परंपरा की भाषा नहीं है, जैसी कि उर्दू है। संयुक्ताक्षरों के साथ जैसा व्यवहार उर्दू भाषा में होता है वैसा तो हिंदी में सोचा तक नहीं जा सकता। लेकिन कथित अदब के नाम पर उनकी जैसी अधिनायकी चलती है कि उच्चारण को लेकर उर्दू भाषियों की विवशता पर अधिकांश हिंदी भाषी लोग पलट कर प्रश्न तक नहीं कर पाते। तत्सम शब्दों के उच्चारण वाचिक तौर पर नहीं होते। संस्कृत के शब्दों का भदेस उच्चारण भाषा को विकलांग करने का काम करेगा। 

    सादर

  • Sushil Sarna

    आदरणीय जी भविष्य के लिए  स्पष्ट हुआ ।हार्दिक आभार आदरणीय जी