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कौन क्या कहता नहीं अब कान देते // सौरभ

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जब जिये हम दर्द.. थपकी-तान देते
कौन क्या कहता नहीं अब कान देते 

 
आपके निर्देश हैं चर्या हमारी
इस जिये को काश कुछ पहचान देते

जो न होते राह में पत्थर बताओ
क्या कभी तुम दूब को सम्मान देते ?

बन गया जो बीच अपने हम निभा दें
क्यों खपाएँ सिर इसे उन्वान देते

दिल मिले थे, लाभ की संभावना भी,
अन्यथा हम क्यों परस्पर मान देते ?

जो थे किंकर्तव्यमूढों-से निरुत्तर
आज देखा तो मिले वे ज्ञान देते

आ गये फिर फूल क्या 'सौरभ' हॄदय में
दिख रहे हैं लोग फिर गुलदान देते
***
सौरभ

(मौलिक और अप्रकाशित) 

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  • सदस्य टीम प्रबंधन

    Saurabh Pandey

    आदरणीय रवि भाईजी, आपके सचेत करने से एक बात अवश्य हुई, मैं ’किंकर्तव्यविमूढ़’ शब्द के वैन्यासिक उच्चारण पर पुनर्चिंतन किया. वस्तुतः, कई विद्वान रचनाकार अपनी क्षेत्रीय या बोलचाल की भाषा की प्रकृति के अनुरूप विदेसज या तत्सम शब्दों के विन्यास को उच्चारण के अनुसार शाब्दिक कर लेते हैं. इसे आप भी जानते हैं. मैंने भी ऐसा ही करने का एक प्रयास किया था. लेकिन आपको उत्तर देने के बाद मैंने इस बिन्दु पर हर तरह से सोचा और आपके मन में बना अटपटापन मुझे भी तार्किक लगा. 
    अतः मैं ’किंकर्तव्यविमूढ़’ शब्द के विमूढ़ को मूढ़ कर, चूँकि विशेष मूढ़ ही विमूढ़ होता है, उक्त शब्द को ’किंकर्तव्यमूढ़’ कर लिया. इससे आपके मन मे इस शब्द के विन्यास को लेकर  जो असहजता बनी थी, उसका भी निवारण हो गया तथा मिसरा भी आपकी सोच के अनुसार बहर में आ गया. 

    यही तो इस मंच की विशेषता है. यहाँ रचनाओं पर बातें खुल कर होती हैं और मिल-बैठ कर शकाओं का उचित समाधान भी हो जाता है. आपकी जागरुकता तथा प्रयुक्त शब्द को लेकर मन में उपजे संदेह के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद, कि मैं भी इस तथ्य पर पुनर्विचार कर पाया. 
    शुभ-शुभ

  • रवि भसीन 'शाहिद'

    आदरणीय सौरभ पांडे जी, नमस्कार। बहुत सुंदर ग़ज़ल कही है आपने, इस पे शेर-दर-शेर हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए।

    /बन गया जो बीच अपने हम निभा दें

    क्यों खपाएँ सिर इसे उन्वान देते/

    यह शेर विशेष रूप से बहुत पसंद आया। सादर


  • सदस्य टीम प्रबंधन

    Saurabh Pandey

     

    आदरणीय रवि भसीन ’शाहिद’ जी, प्रस्तुति पर आपका स्वागत है।

    इस गजल को आपका अनुमोदन मिला। आपसे मिले उत्साहवर्द्धन के लिए हार्दिक आभार 

    शुभ-शुभ