कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं-लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"

जोगी सी अब न शेष हैं जोगी की फितरतें
उसमें रमी हैं आज भी कामी की फितरते।१।
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कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं
चढ़ती हैं आदमी में जो कुर्सी की फितरतें।२।
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कहने लगे हैं चाँद को,  सूरज को पढ़ रहे
समझे नहीं हैं लोग जो धरती की फितरतें।३।
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किस हाल में सवार हैं अब कौन क्या कहे
भयभीत नाव देख के  माझी  की फितरतें।४।
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पूजन सफल समाज में कन्या का है तभी
उसमें समायें मान को काली की फितरतें।५।
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मौलिक/अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी "मुसाफिर"


  • सदस्य टीम प्रबंधन

    Saurabh Pandey

    आदरणीय लक्ष्मण धामी जी, इस गजल को अभी तनिक और समय दिया जाना था. 

    सादर

     

  • लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर'

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