"आदरणीय मिथिलेश जी के कहे से मैं भी सहमत हूँ। कैलेंडर प्रथम सप्ताह में आ जाय और हफ्ते बाद सभी आयोजन एक साथ चलें अगले पन्द्रह दिनों तक।आशा है ये नया प्रारूप आयोजनों में फिर से उत्साह ले आयगा।"
"सभी आदरणीय को नमस्कार। आदरणीय तिलक राज कपूर जी का ये उत्तम विचार है। अगर इसमें कुछ परेशानी हो तो एक कार्यक्रम प्रति सप्ताह कर दिया जाये। इससे भी लाभ होगा। कुछ दिनों तक ऐसा भी करके देखा जा सकता है।…"
दोहा सप्तक. . . . . युद्धहरदम होता युद्ध का, विध्वंसक परिणाम ।बेबस जनता भोगती , इसका हर अंजाम ।।दो देशों के मध्य जब, होता है संग्राम ।जाने कितने चेहरे , हो जाते गुमनाम ।।कौन करेगा आकलन , कितना हुआ…See More
"इस सारी चर्चा के बीच कुछ बिन्दु और उभरते हैं कि पूरे महीने सभी आयोजन अगर ओपन रहेंगे तो प्रतिक्रियाएं घट सकती हैं। कौन कब-कब आयोजन को खोल कर देखेगा कि नई रचना आई है या नहीं।
1. यूँ भी यदि…"
"आदरणीय, नमस्कार
यह नव प्रयोग अवश्य सफलता पूर्वक फलीभूत होगा ऐसा मेरा विश्वास है
तथा हमें अधिकाधिक सीखने को भी मिलेगा जितनी जल्दी शुरुआत हो उतना अच्छा "
"तरही का मुख्य उद्देश्य अभ्यास तक सीमित है, इस दृष्टि से और बहरों पर भी तरही मिसरे देना कठिन न होगा लेकिन ग़ज़ल की बहुत कम बहर हैं जो सामान्यतः चलन में हैं। इसकी पृष्ठभूमि में मुख्य कारण है प्रवाह…"
दोहा सप्तक. . . . . घूस बिना कमीशन आजकल, कब होता है काम । कैसा भी हो काम अब, घूस हुई है आम ।। घास घूस की भा रही, हर बाबू को आज । जेब दनादन भर रहे, लेकिन रखते राज ।। जिसको देखो घूस का, अजब लगा है…See More
"सादर नमस्कार। मुझे ऐसी ही एक चर्चा की अपेक्षा थी। आवश्यकता महसूस हो रही थी। हार्दिक धन्यवाद और शुभकामनाएं।
मेरा विचार है कि दस-दस दिन के लिए प्रत्येक आयोजन हेतु एक वरिष्ठ साहित्यकार को मंच…"