"सुना ही था "बड़ी मुश्किल ये डगर है साईं"
राह-ए-ईमाँ का तो गुल तक भी शरर है साईं
जो झुका रहता हो बस बोझ वो सर है साईं
रीढ़ जिस में नहीं वो क्या ही कमर है…"
"कोख से मौत तलक रात अमर है साईंअपने हिस्से में भला कौन सहर है साईं।१।*धूप ही धूप मिली जब से सफर है साईंपग नहीं अपने पड़े छाँव जिधर है साईं।२।*वासना ही तो चढ़ी सबकी नजर है साईंरूह का प्यार …"
"आदरणीय लक्ष्मण भाई, नमस्कार। इस प्रस्तुति पे हार्दिक बधाई स्वीकार करें। हर शेर में सार्थक विचार हैं।
/कुर्सी जिसे भी सौंप दो बदलेगा कुछ नहीं
चढ़ती हैं आदमी में जो कुर्सी की फितरतें।२।/
मेरे ख़्याल से…"
"आदरणीय सौरभ पांडे जी, नमस्कार। बहुत सुंदर ग़ज़ल कही है आपने, इस पे शेर-दर-शेर हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए।
/बन गया जो बीच अपने हम निभा दें
क्यों खपाएँ सिर इसे उन्वान देते/
यह शेर विशेष रूप से बहुत…"
"आदरणीय लक्ष्मण भाई, नमस्कार। काफ़ी देर के बाद मिल रहे हैं। इस सुंदर प्रस्तुति पे बधाई स्वीकार करें।
/भूले हैं सिर्फ लोग न सच को निहारना/
इस शेर के शिल्प में सुधार की गुंजाइश लग रही है। एक…"