"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत हरिगीतिका छंद पर आपकी प्रतिक्रिया से सृजन सफल हुआ है. आपके द्वारा उल्लेखित पंक्तियों को पुनः पढ़कर आवश्यक परिमार्जन करने का प्रयास करता हूँ. सादर "
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आदरणीय अशोक भाईजी,
श्रावण मास का आज प्रथम सोमवार है. ऐसे पवित्र दिवस पर आप द्वारा प्रस्तुत हरिगीतिका जैसे प्रवहमान छंद में शिव महिमा पढ़ने को मिली. मन धन्य हो गया.
जयकार शिव की कर रहे…"
"आदरणीय रोहित डोबरियाल "मल्हार" जी, आपकी भावुक प्रस्तुतीकरण का स्वागत है.
आप इस पटल के माध्यम से इस प्रस्तुति को सार्थक गजल-विन्यास दे कर वरिष्ठों से सुझाव ले सकते…"
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निर्निमेष आँखों की प्रतीक्षा उत्कट तीव्रता के साथ शाब्दिक हुई है, आदरणीय विजय निकोर जी.
कथ्य को सार्थक वियास मिला है
इस बार जो मैं साँकल खोलूँतो आनाद्वार पर तुम ही होना ..…"