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एक ग़ज़ल (वैलेंटाइन डे स्पेशल)

एक ग़ज़ल।
**********

बँध गई हैं एक दिन से प्रेम की अनुभूतियाँ
बिक रही रैपर लपेटे प्रेम की अनुभूतियाँ

शाश्वत से हो गई नश्वर विदेशी चाल में
भूल बैठी स्वयं को ऐसे प्रेम की अनुभूतियाँ

प्रेम पथ पर अब विकल्पों के बिना जीवन नहीं
आज मुझ से, कल किसी से, प्रेम की अनुभूतियाँ

पाप से और पुण्य से हो कर पृथक ये सोचिए
लज्जा में लिपटी हैं क्यों ये प्रेम की अनुभूतियाँ

परवरिश बंधन में हो तो दोष किसको दीजिये
कैसे पहचानेंगे बच्चे प्रेम की अनुभूतियाँ

#मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by अजेय on February 20, 2019 at 6:07pm

जी, शुक्रिया। 

Comment by Samar kabeer on February 20, 2019 at 2:54pm

'प्रेम पथ पर अब कहाँ जीवन विकल्पों के बिना '

यूँ कर लें ।

Comment by अजेय on February 20, 2019 at 2:45pm

आदरणीय समर साहब आप ने बहुत उत्तम सुझाव दिया जो निश्चित रूप से लय बढ़ाएगा।

लेकिन इससे इता का ऐब आ जायेगा। कृपया मार्गदर्शन करें।

Comment by Samar kabeer on February 16, 2019 at 2:28pm

जनाब अजय गुप्ता जी आदाब,ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

'प्रेम पथ पर अब विकल्पों के बिना जीवन नहीं'

इस मिसरे में तनाफ़ुर देखें,'नहीं की जगह "कहाँ" कर सकते हैं ।

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