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भावना के वेग से प्रेम के वाशीभूत हो
नैनो को करके सजल वो रात की रानी सी बहना ।
राम की मूरत निहारे कहे चाहिए भाई सा गहना
मन निकले कुछ स्वर तो बोले खुद ही बोल
मेरे आज से बस राम तेरे उन्ही को तू भाई कहना ।
मांगती हूँ एक वचन बांधकर रेशम की डोरउ
शाम हो या हो सवेरा जेठ की तपती दोपहरी
या शर्द रात्री का हो पहरा
जाऊ जिस भी मोड़ से में जिंदगी के हर मोड़
पर भाई मेरे संग संग ही रहना ।


मौलिक एवम् अप्रकाशित ।

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Comment by Saurabh Pandey on August 31, 2015 at 6:38pm

संयत प्रयास करें भाईजी. तथा, सर्वोपरि, किसी रचना को पोस्ट करने के पूर उसे दो-तीन-चार दफ़े पढ़ जाया कर्रें कि कहीं वर्तनी दोष तो नहीं रह गया है. या कोई व्याकरण सम्बन्धी त्रुटि नहीं रह गयी है. 

शुभेच्छाएँ 

Comment by Manoj kumar Ahsaas on August 30, 2015 at 7:04pm
बहुत खूब
सादर

कृपया ध्यान दे...

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