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तेरे धोखे को दुनिया भर की नजरों से छिपाया था//शकील जमशेदपुरी//

बह्र : 1222/1222/1222/1222

________________________________

तेरे धोखे को दुनिया भर की नजरों से छिपाया था
समझ लेना ये तेरे दिल में रहने का किराया था

सुनो वो गांव अपना इसलिए मैं छोड़ आया हूं
हमारे प्यार का मौसम वहां पर लौट आया था

तुम्हारी याद की चादर, तुम्हारे गम का बिस्तर था
तुम्हारे प्यार ने ऐसा भी मुझको दिन दिखाया था

चलो माना मैं पत्थर दिल हूं, लेकिन हद भी होती है
मैं हर इक सिम्त से टूटा, यूं उसने आजमाया था

मुझे हैरत है तेरे बिन भी मैं जिंदा रहा कैसे?
तुम्हें मालूम है? इक बार मैंने जह्र खाया था

-शकील जमशेदपुरी

________________________________

*मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by Vindu Babu on May 15, 2014 at 5:47pm
सुन्दर गज़ल कही है आपने।
हार्दिक बधाई स्वीकारें आदरणीय जमशेदपुरी जी...
सादर
Comment by शकील समर on May 15, 2014 at 5:39pm

बहुत—बहुत आभार आदरणीय शिज्जु शकूर जी।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 15, 2014 at 5:26pm

//चलो माना मैं पत्थर दिल हूं, लेकिन हद भी होती है
मैं हर इक सिम्त से टूटा, यूं उसने आजमाया था//  वाह क्या बात है जनाब शकील भाई बहुत खूब

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