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2122/ 2122/ 2122/ 212

कातिलों के शह्र में अहले जिगर आते नहीं

भीड़ से होकर परे चहरे नज़र आते नहीं

 

मेरे चारों ओर किस्मत ने बना दी बाड़ सी

हाल ये है अब परिन्दे तक इधर आते नहीं

 

वक्त सा होने लगा है दोस्तों का अब मिजाज़

गर चले जायें तो वापस लौटकर आते नहीं

 

ज़ीस्त के कुछ रास्तों पे तन्हा चलना ठीक है

क्यूँकि अक्सर साथ अपने राहबर आते नहीं

 

नक्शे-माज़ी देखने को आते तो हैं रोज़-रोज़

खण्डहर में लोग रहने को मगर आते नही

 

कामयाबी की लिखी जाये जहाँ से दास्ताँ

याद लोगों को पुराने वो नगर आते नहीं

 

-मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by शिज्जु "शकूर" on March 12, 2014 at 1:34pm

आदरणीय विजय जी आपका हार्दिक आभार


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Comment by शिज्जु "शकूर" on March 12, 2014 at 1:34pm

आदरणीया राजेश दीदी आपका बहुत बहुत शुक्रिया। आपके और मेरे विचार बहुत मिलते हैं जो मिसरा आपने सुझाया है मैंने पहले वही लिखा था लेकिन बाद में एक शेर और बना जिसमें "इधर" काफिया का प्रयोग हुआ इसलिये इस शेर में थोड़ा फेर बदल करना पड़ा।


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Comment by शिज्जु "शकूर" on March 12, 2014 at 1:29pm

आदरणीय नीरज जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया। अर्ध ''स" के पहले और बाद में दीर्घ मात्रायें हो तो आधे  "स" की तक्ती स्वतंत्र ''स" यानि एक लघु मात्रा की तरह की जाती है इस तरह यदि "रस्ता" हो तो वज्न 22 होगा और "रास्ता" हो तो 212 हो जायेगा

Comment by विजय मिश्र on March 12, 2014 at 1:08pm
उम्दा अन्दाज , भाई बधाई

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Comment by rajesh kumari on March 12, 2014 at 11:41am

वाह वाह शिज्जू भाई कमाल की ग़ज़ल लिखी है सभी शेर लाजबाब है इस  शेर पर एक सलाह देना चाहती हूँ ---

हाल ये है अब परिन्दे भी उतर आते नहीं-----हाल ये है अब परिंदे तक इधर आते नहीं ---लिखे तो मिसरा स्पष्ट होगा 

एक तो परिंदे भी करने से बात पहले से कनेक्टेड लगती है दूसरे उतर आते नहीं में उतर के बाद कर न होने से खटक रहा है  

 ये शेर इतना नायाब है तभी मुझसे रुका नहीं जा रहा और सलाह दे रही हूँ .यदि आपको स्वीकार्य हो ..इस शानदार ग़ज़ल पर तहे दिल से ढेरों बधाई. 

Comment by Neeraj Neer on March 12, 2014 at 9:36am

वाह बहुत खूबसूरत  ग़ज़ल..       ये दोस्तों , रास्तों में कितनी मात्राएँ होती है , इसकी गिनती कैसे करते हैं ? ये २१२ होते हैं या २२ ..?


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Comment by शिज्जु "शकूर" on March 11, 2014 at 9:52am

आदरणीया मीना जी आपका हार्दिक आभार


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Comment by शिज्जु "शकूर" on March 11, 2014 at 9:52am

आदरणीया वंदना जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


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Comment by शिज्जु "शकूर" on March 11, 2014 at 9:51am

आदरणीय गिरिराज सर आपकी उपस्थिति सदैव हर्षित करती है आपका हार्दिक आभार


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Comment by शिज्जु "शकूर" on March 11, 2014 at 9:50am

आदरणीय मयंक जी आपने मेरी रचना को मान दिया आपका बहुत बहुत शुक्रिया

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