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इंतजार 

करता हूँ इंतजार उसका 

कब वह आयेगी 

हाँ कब वह आयेगी 

सुबह से शाम तक 

रात से सुबह तक 

न सो  पाया पूरी रात 

उसके इंतजार में 

दो दिन से उम्मीद 

लगाये बैठा हूँ 

शायद अब आ जाये 

शायद अब आ जाये 

पर उसे मेरा ख्याल 

 धोखा दिया है उसने 

आखिरी बार कब आई थी 

ये भी याद नहीं है मुझको 

हाँ मैं बात कर रहा हूँ बिजली की 

हाँ उस बिजली  की 

जिसने मुझे सोने नहीं दिया 

इस जून की गर्मी में 

पसीने से नहला  दिया मुझको 

करता हूँ उसका इंतजार 

अब तो आ जाए 

अब तो आ जाए . . . . . . . . ..  ..

"मौलिक व अप्रकाशित" 

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Comment

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Comment by बृजेश नीरज on June 12, 2013 at 7:26am

बहुत सुन्दर प्रयास आपका! इस हास्य कविता पर मेरी बधाई स्वीकारें!

Comment by Shyam Narain Verma on June 10, 2013 at 12:29pm
बहुत सुन्दर...बधाई स्वीकार करें ………………
Comment by Sumit Naithani on June 10, 2013 at 12:25pm

बिजली का इंतज़ार ...सच मे बहुत मुश्किल होता है करना.... बहुत खूब 

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