For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

छत पे उगे जो चाँद निहारा न कीजिए

छत पे उगे जो चाँद निहारा न कीजिए
सूरजमुखी का दिन में नज़ारा न कीजिए

महफ़ूज़ रह न पायेगी आँखों की रौशनी
दीदार हुस्ने-बर्क़ खुदारा न कीजिए

शरमा के मुँह न फेर ले आईना, इसलिये
ज़ुल्फ़ों को आइने में संवारा न कीजिए

ऐसा न हो कि ख़ुद को भुला दें हुज़ूर आप
इतना भी अब ख़याल हमारा न कीजिए

एहसा किसी पे कर के, किसी को तमाम रात
ताने ख़ोदा के वासते मारा न कीजिए

दिल जिस से चौक जाये किसी राहगीर का
अब उसका नाम ले के पुकारा न कीजिए

वाइज़ नमाज़े-सुब्ह न हो जाए अब कज़ा
यूँ मैक़दे में रात गुज़ारा न कीजिए

‘अफ़सोस’ ज़िन्दगी में बज़ुज़ अपने आप के
भूले से भी किसी का सहारा न कीजिए

Views: 514

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on November 26, 2011 at 11:29pm

ऐसा न हो कि ख़ुद को भुला दें हुज़ूर आप
इतना भी अब ख़याल हमारा न कीजिए

वाह वाह गाजीपुरी से बहुत ही खुबसूरत ग़ज़ल की प्रस्तुति है, सभी शेर मखमली अंदाज में कहे गए है, मतला से मकता तक तारीफ़ के योग्य है दाद कुबूल करे | 

Comment by satish mapatpuri on November 26, 2011 at 6:57am

ऐसा न हो कि ख़ुद को भुला दें हुज़ूर आप
इतना भी अब ख़याल हमारा न कीजिए

सुभानअल्लाह................... खुबसूरत ख्याल ............
दाद कुबूल फरमाएं हुजुर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 26, 2011 at 12:25am

आदाब है आदरणीय अफ़सोस जी. पूरी ग़ज़ल रुमानियत और दुनियावी पेंचोखम से गुजरती नये मंजर दिखाती चलती है.

महफ़ूज़ रह न पायेगी आँखों की रौशनी
दीदार हुस्ने-बर्क़ खुदारा न कीजिए

वल्लाह, क्या ही सलाह है.

 

एहसा किसी पे कर के, किसी को तमाम रात
ताने ख़ोदा के वासते मारा न कीजिए

किस महीनी को इशारा कर बैठे हुज़ूर !! .. .वाह-वाह !!!

 

इससे पहले कि मक्ते पे दाद दूँ जिसमें आपने तमाम एहसास उड़ेल डाला है,  इस शे’र पर बधाई --

वाइज़ नमाज़े-सुब्ह न हो जाए अब कज़ा
यूँ मैक़दे में रात गुज़ारा न कीजिए.

 

इस बेदाग़ ग़ज़ल के लिये ढेरों दाद दे रहा हूँ, अफ़सोस साहब.

Comment by वीनस केसरी on November 25, 2011 at 11:32pm

बाकमाल अशआर के लिए ढेरो दाद कबूल करें

यह तीन शेर खास पसंद आये

महफ़ूज़ रह न पायेगी आँखों की रौशनी
दीदार हुस्ने-बर्क़ खुदारा न कीजिए

ऐसा न हो कि ख़ुद को भुला दें हुज़ूर आप
इतना भी अब ख़याल हमारा न कीजिए

वाइज़ नमाज़े-सुब्ह न हो जाए अब कज़ा
यूँ मैक़दे में रात गुज़ारा न कीजिए

Comment by आशीष यादव on November 25, 2011 at 10:30am

bahut hi achchhi lagi ye ghazal. sabhi she'r bahut achche lage.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Rana Pratap Singh on November 25, 2011 at 9:19am

बहुत खूबसूरत गज़ल| हर शेर पसंद आया और ये शेर बहुत पसंद आये |

 

महफ़ूज़ रह न पायेगी आँखों की रौशनी
दीदार हुस्ने-बर्क़ खुदारा न कीजिए

ऐसा न हो कि ख़ुद को भुला दें हुज़ूर आप
इतना भी अब ख़याल हमारा न कीजिए

वाइज़ नमाज़े-सुब्ह न हो जाए अब कज़ा
यूँ मैक़दे में रात गुज़ारा न कीजिए

ढेर सारी दाद कबूलिये|

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Euphonic Amit commented on Mamta gupta's blog post गजल
"अच्छी ग़ज़ल कही आपने बधाई "
16 hours ago
Aazi Tamaam posted a blog post

ग़ज़ल : मिज़ाज़-ए-दश्त पता है न नक़्श-ए-पा मालूम

१२१२ ११२२ १२१२ २२मिज़ाज़-ए-दश्त पता है न नक़्श-ए-पा मालूमहमारे दर्द-ए-जिगर का भी किसको क्या…See More
21 hours ago
Mamta gupta posted a blog post

गजल

बह्र-2122 2122 2122 212काफ़िया- गुमरही "ई" स्वररदीफ़-"क्या चीज़ है"ग़ज़ल-समझा राहे-दिल से हट कर गुमरही…See More
21 hours ago
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

ग़ज़ल

2122    1212   112/22*ज़ीस्त  का   जो  सफ़र   ठहर   जाएआरज़ू      आरज़ू      बिख़र     जाए बेक़रारी…See More
21 hours ago
धर्मेन्द्र कुमार सिंह posted a blog post

जो कहता है मज़ा है मुफ़्लिसी में (ग़ज़ल)

1222 1222 122-------------------------------जो कहता है मज़ा है मुफ़्लिसी मेंवो फ़्यूचर खोजता है लॉटरी…See More
21 hours ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Er. Ganesh Jee "Bagi"'s discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-164
"आ. भाई मिथिलेश जी, सादर अभिवादन।गीत पर पुनः उपस्थिति और विस्तृत सुझावपूर्ण टिप्पणी के लिए हार्दिक…"
yesterday

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Er. Ganesh Jee "Bagi"'s discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-164
"नदियाँ लूटीं जंगल काटे रस्ते करते पर्वत नाटे आदरणीय व्याकरण की गलती को ऐसे ठीक किया है। बाकी इस…"
yesterday

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Er. Ganesh Jee "Bagi"'s discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-164
"काटे जंगल, नदिया लूटीव्यापारी बन दौलत कूटी।। नदी को गीतकारों ने नदिया भी कहा है। जैसे नदिया…"
yesterday

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Er. Ganesh Jee "Bagi"'s discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-164
"अनुमोदन हेतु हार्दिक धन्यवाद आपका। सादर"
yesterday

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Er. Ganesh Jee "Bagi"'s discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-164
"अनुमोदन हेतु हार्दिक धन्यवाद आपका। सादर"
yesterday

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Er. Ganesh Jee "Bagi"'s discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-164
"अनुमोदन हेतु हार्दिक धन्यवाद आपका। सादर"
yesterday

सदस्य कार्यकारिणी
मिथिलेश वामनकर replied to Er. Ganesh Jee "Bagi"'s discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-164
"बहरहाल प्रदत्त विषय को सार्थक करते बहुत बढ़िया सार छंद हुए हैं। इस प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई…"
yesterday

© 2024   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service