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अब तो इंसाफ भी करें साहिब.......ग़ज़ल सालिक गणवीर

2122-1212-22/112
अब तो इंसाफ भी करें साहिब
हक़ मिरा मुझको दे भी दें साहिब (1)

ऊँचे पेड़ों ने फिर से की साजिश
लोग सब धूप में रहें साहिब (2)

आप सब क्यों उड़े हवाओं में
हम ज़मीं पर ही क्यों चलें साहिब (3)

काग़ज़ों पर लिखा तो पढ़ते हैं
पीठ पर भी कभी लिखें साहिब (4)

न ज़मीं है न आसमाँ अपना
ये बता दो कहाँ रहें साहिब (5)

इतना अफ़सोस है अगर फिर तो
शर्म से डूब कर मरें साहिब (6)

आप सुनते नहीं किसी की तब
आपसे हम भी क्या कहें साहिब(7)

*मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on December 4, 2021 at 2:40pm

जनाब सालिक गणवीर जी आदाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ। शे'र नं. 4 पर गुणीजनों से सहमत हूँ, मिसरा -

'इतना अफ़सोस है अगर 'फिर तो' में 'तुम को' कह कर देखें। सादर। 

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 2, 2021 at 12:32pm

आ. भाई सालिक गणवीर जी, सादर अभिवादन। गजल का प्रयास अच्छा हुआ है। हार्दिक बधाई।

Comment by सालिक गणवीर on November 18, 2021 at 12:22pm

आदरणीया  Rachna दी 
सादर नमस्कार
ग़ज़ल पर आपकी आमद और सराहना के लिए हार्दिक आभार. इस्लाह के लिए बहुत शुक्रिया

Comment by सालिक गणवीर on November 18, 2021 at 12:21pm

आदरणीय  बृजेश कुमार 'ब्रज' जी
सादर नमस्कार
ग़ज़ल पर आपकी आमद और सराहना के लिए हार्दिक आभार. 

Comment by सालिक गणवीर on November 18, 2021 at 12:21pm

आदरणीय Sushil Sarna   जी
सादर नमस्कार
ग़ज़ल पर आपकी आमद और सराहना के लिए हार्दिक आभार. 

Comment by Rachna Bhatia on November 17, 2021 at 10:07am

आदरणीय सालिक गणवीर जी बेहतरीन रदीफ़ के साथ आपने अच्छी ग़ज़ल कही। हार्दिक बधाई।

4 समझने में मुश्किल आ रही है।

5 में "अगर फिर तो" को आपको है तो में बदल सकते हैं।

सादर।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 15, 2021 at 6:27pm

बढ़िया कहा आदरणीय सालिक जी...बधाई

Comment by Sushil Sarna on November 14, 2021 at 12:45pm
वाह बहुत सुंदर गजल बनी है सर । हार्दिक बधाई
Comment by सालिक गणवीर on November 14, 2021 at 12:35pm

आदरणीय भाई  Nilesh Shevgaonkar  जी
सादर नमस्कार
बड़ी मेहरबानी जो आप मेरी ग़ज़ल तक आये और हौसला अफ़ज़ाई की,आपका तह-ए दिल से शुक्रगुज़ार हूँ। आपके सुझाव पर अमल ज़रूर होगा जनाब ,.सलामत रहें.

Comment by Nilesh Shevgaonkar on November 14, 2021 at 11:21am

आ. सालिक जी 
अच्छी ग़ज़ल हुई है ..
दे भी दें  ज़बान सिखाने वाला जुमला है कि कहाँ ए आएगा और कहाँ अनुस्वार के साथ ए आएगा.
 
शिल्पगत रूप से ग़ज़ल परिपक्व है.. भाव के लिहाज से शेर थोड़े कमज़ोर हैं.. जैसे 
पीठ पर भी कभी लिखें साहिब.. इस मिसरे का कोई औचित्य नहीं प्रतीत होता .. आप से भविष्य में सुदृढ़ भावों की अपेक्षा है..
बधाई 

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