For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

ग़ज़ल -सूनी सूनी चश्म की फिर सीपियाँ रह जाएँगी

वज़्न - 2122 2122 2122 212

ज़ीस्त की शीरीनियों से दूरियाँ रह जाएँगी
बिन तुम्हारे महज़ मुझ में तल्ख़ियाँ रह जाएँगी

वक़्त-ए-रुख़सत अश्क के गौहर लुटाएँगी बहुत
सूनी सूनी चश्म की फिर सीपियाँ रह जाएँगी

रेत पर लिख कर मिटाई हैं जो तुमने मेरे नाम
ज़ह्न में महफ़ूज़ ये सब चिट्ठियाँ रह जाएँगी

बातें मूसीक़ी-सी तेरी हैं मगर कल मेरे साथ
गुफ़्तगू करती हुई ख़ामोशियाँ रह जाएँगी

एक घर हो घर में तुम हो तुमसे सारी रौनकें
मेरे इन ख़्वाबों की इक दिन किरचियाँ रह जाएँगी

इश्क़ मेरा है मजाज़ी या हक़ीक़ी उंस है
बाद मेरे उलझी सारी गुत्थियाँ रह जाएँगी

'आरज़ू' थी हो मुकम्मल शख़्सियत मेरी मगर
तुमको खो कर मुझमें कितनी ख़ामियाँ रह जाएँगी

-©अंजुमन 'आरज़ू'
स्वरचित एवं अप्रकाशित

Views: 138

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on October 30, 2021 at 7:15pm

आदाब। अतीत, वर्तमान और भविष्य की हक़ीक़त बयाँ करती ख़ूबसूरत ग़ज़ल हेतु हार्दिक बधाई आदरणीया अंजुमन आरज़ू साहिबा।

Comment by Anjuman Mansury 'Arzoo' on October 19, 2021 at 12:11pm

आदरणीय बृजेश कुमार ब्रज जी आदाब, ,ग़ज़ल तक पहुंचने और हौसला अफ़जाई करने के लिए तहे दिल से शुक्रिया

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 17, 2021 at 4:48pm

वाह क्या कहने...बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही है...हार्दिक बधाई...

Comment by Anjuman Mansury 'Arzoo' on October 16, 2021 at 9:07pm

मोहतरम अमीरुद्दीन अमीर साहब आदाब, ग़ज़ल तक पहुंचने और दादओ तहसीन से नवाज़ने के लिए तहे दिल से शुक्रिया, जी उस्ताद मोहतरम समर कबीर साहब की इस्लाह पर ग़ौर किए बिना ग़ज़ल मुकम्मल कैसे होगी, मूल प्रति में सुधार लिया है यहां भी एडिट करने की कोशिश करती हूं, बहुत शुक्रिया

Comment by अमीरुद्दीन 'अमीर' on October 13, 2021 at 10:01pm

मुहतरमा अंजुमन 'आरज़ू' जी आदाब, ख़ूबसूरत और उम्दा ग़ज़ल हुई है मुबारकबाद पेश करता हूँ । मुहतरम समर कबीर साहिब की इस्लाह पर ग़ौर कीजियेगा।  सादर।

Comment by Anjuman Mansury 'Arzoo' on October 13, 2021 at 5:54pm

आदरणीय नाथ सोलंकी जी आदाब, ग़ज़ल तक पहुंचने और हौसला अफ़ज़ाई  करने के लिए तहे दिल से शुक्रिया

Comment by नाथ सोनांचली on October 13, 2021 at 3:59pm

आद0 अंजुमन मंसूरी जी सादर अभिवादन। बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने।बधाई स्वीकार कीजिये। आद0 समर साहब की इस्लाह से मुझे भी सीखने को मिलेगा

Comment by Samar kabeer on October 12, 2021 at 8:38pm

'बातें मूसीक़ी-सी तेरी हैं मगर कल मेरे साथ'

ये मिसरा अब ठीक है ।

बाक़ी बातें फ़ोन पर समझ लें ।

Comment by Anjuman Mansury 'Arzoo' on October 12, 2021 at 5:28pm

उस्ताद मोहतरम समर कबीर साहब आदाब, ग़ज़ल तक पहुंचने और इस्लाह करने के लिए तहे दिल से शुक्रिया
एडिट करने की कोशिश कर रही हूं लेकिन मुझ से हो नहीं पा रहा मोहतरम, मूल प्रति में सुधार लूंगी

वह मिस्रा कुछ इस तरह कहा है -

बातें मूसीक़ी-सी तेरी हैं मगर कल मेरे साथ


पटल पर मौजूद दीगर रचनाओं तक पहुंचना चाह कर भी मैं नहीं पहुंच पा रही हूं, धीरे-धीरे सीख कर वहां तक भी पहुंच आऊंगी और इंशा अल्लाह प्रतिक्रिया भी दूंगी ।
इस पटल पर पढ़ पाना मेरे लिए थोड़ा मुश्किल भी है ।

Comment by Samar kabeer on October 12, 2021 at 3:24pm

मुहतरमा अंजुमन `आरज़ू` जी आदाब, ग़ज़ल का अच्छा प्रयास हुआ है, बधाई स्वीकार करें I

`वक़्त-ए-रुख़सत अश्क के गौहर लुटाएँगी बहुत `

इस मिसरे में `बहुत` की जगह "अगर" शब्द रखना उचित होगा I 

`रेत पर लिख कर मिटाई है जो तुमने मेरे नाम
ज़ेहन में महफ़ूज़ ये सब चिट्ठियाँ रह जाएँगी`

इस शे`र के ऊला मिसरे में `है` को "हैं" और सानी में `ज़ेहन` को "ज़ह्न" कर लें I 

`मौसिक़ी सी हैं तेरी बातें मगर कल मेरे साथ` 

इस मिसरे में सहीह शब्द "मूसीक़ी " 222 है , मिसरा बदलने का प्रयास करें I 

एक निवेदन ये है कि पटल पर मौजूद रचनाओं पर भी अपनी टिप्पणी दिया करें , ये आपकी अख़लाक़ी ज़िम्मेदारी है I 

बाक़ी शुभ शुभ I 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Blogs

Latest Activity


सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-137
"आदरणीय दण्डपाणि नाहक जी, किसी शब्द के किस गुरु वर्ण को गिरा कर पढ़ा जा सकता है, इस समझ पर गौर…"
3 minutes ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-137
"आदरणीया रिचा जी, एक सुझाव : मक्ते का नाम या तखल्लुस की कोई मात्रा नहूं गिरायी जाती. यह मान्य नियम…"
6 minutes ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-137
"आदरणीय चेतन प्रकाश जी, आपके कहे पर विद्वद्जन अपनी-अपनी बातें करेंगे. किंतु मेरा सुझाव शिकस्ते…"
10 minutes ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-137
"आदरणीय दयाराम जी, आपके प्रयास पर हार्दिक बधाइयाँ.  गुणीजनों, विशेषकर लक्ष्मण जी के कहे का…"
15 minutes ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-137
"मुझे उसकी उल्फतों पर यकीं आए कैसे तस्दीककरे बात मुझ से अक्सर जो नज़र बदल बदल के...  वााह…"
18 minutes ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-137
"इस बेहतर कोशिश के लिए हार्दिक बधाइयाँ, आदरणीय सालिक गणवीर जी.  समय होता तो आपके अश'आर और…"
23 minutes ago

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-137
"आपसे जो कुछ कहना था, मैंने कह दिया. आप किन्हीं और की टिप्पणी की बातें मेरे सिर डाल कर अन्यथा कहे जा…"
28 minutes ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' posted blog posts
38 minutes ago
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-137
"जी, अब ठीक है।"
1 hour ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-हमारे आँसू
"स्वागत संग आभार आदरणीय धामी जी..."
2 hours ago
बृजेश कुमार 'ब्रज' commented on बृजेश कुमार 'ब्रज''s blog post ग़ज़ल-तुम्हारे प्यार के क़ाबिल
"बहुत बहुत आभार आदरणीय धामी जी...सादर"
2 hours ago
dandpani nahak replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-137
"बहुत-बहुत शुक्रिया आ.भाई लक्ष्मण जी मतला यूँ पढ़ें 'ये कहा था उसने मुझको तो बिछड़ते ही मचल…"
2 hours ago

© 2021   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service