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अहसास की ग़ज़ल : मनोज अहसास

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चलो अच्छा हुआ वो अब पता पाने नहीं आते ।
खलिश ये रह गई दिल में सितम ढाने नहीं आते।

मुझे उस पार के लोगों से बस इतनी शिकायत है,
सफर कैसा रहा वो ये भी बतलाने नहीं आते।

तमाशा बन गई है दोस्ती नफरत की दुनिया में,
पुराने यार भी मुश्किल में समझाने नहीं आते।

हमारी बात तो दिलकश तुम्हें लग ही नहीं सकती,
हमें तहज़ीब तो आती है अफसाने नहीं आते ।

झुलस जाती है मेरी सोच अनचाहे ख्यालों से ,
तुम्हारे ख़्वाब भी आँखों को बहलाने नहीं आते ।

तुम्हें मालूम कैसे हो मैं कितनी मुश्किलों में हूँ,
ज़माने भर में दर्दों ग़म के पैमाने नहीं आते ।

हमारे वक्त में ज़हरीला इतना हो गया मौसम ,
किसी के हाथ भी हाथों को सहलाने नहीं आते ।

न जाने कितने लोगों को जगह दी यूँ ही जीवन में,
पता भिजवाने पर भी जो पता पाने नहीं आते।

निगाहें दूर तक करती है पीछा उन ख्यालों का,
जिन्हें अल्फाज़ भी मिसरों में गुँथवाने नहीं आते।

शिकायत लाख हैं उनसे मगर इतनी गनीमत है,
मेरे अहसास के फूलों को ठुकराने नहीं आते।

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on August 31, 2021 at 11:48am
आदरणीय बहुत सुंदर प्रस्तुति हुई है ।हार्दिक बधाई
Comment by Manoj kumar Ahsaas on August 26, 2021 at 8:27pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय रवि शुक्ला जी

सादर

Comment by Ravi Shukla on August 26, 2021 at 12:22pm

आदरणीय मनोज जी उम्दा गजल  कही आपने शेर दर शेर मुबारक बाद  कुबूल करें ।पता पाने नहीं आते। इस का दोहराव हो रहा है गजल में । 

झुलस जाती है मेरी सोच अनचाहे ख्यालों से ,
तुम्हारे ख़्वाब भी आँखों को बहलाने नहीं आते । ये शेर खास पसंद आया बधाई 

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