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विदा की वह शाम ...

विदा  की  वह  शाम

 

प्रबल  झंझावात  के  बाद  मानो

दिशा-दिशा   आकुल अकथ  सुनसान

निस्तब्ध   शांत ... और  इस  पर

दिन  से सम्बन्ध  तोड़  रही

वैभव-विहीन  शाम

 

विदा-काल  की  उस  शाम

सब  कुछ  सामान्य  भी

लगता  था असाधारण

आत्मीय,  फिर  भी  मानो

ओढ़े  दूरी  का आवरण

 

ऐसे  में  कैसे  साहस  बटोर  कर

जाते-जाते  रिक्शा  से  उतर  कर

तुम्हारे  दोनो  हाथ  आवेग  के  वश

मुझसे  लिपट  पड़े

और  तुम्हारे  वह  बोल...

“जाते-जाते  एक और आलिंगन  तो  बनता  है”

उफ़्फ़ !

 

मेरा  भी  एक  हाथ  स्नेह   से तुम्हारे  कंधे  पर

और  दूसरा ... तुम्हारे  मस्तक  का  स्पर्श

वेदना  का  बुखार  था  वहाँ

तेज़ाब-सी  वेदना  जो  आज  तक

बंद  पलकों  के पीछे

भेदी  न  जा  सकी

तुमसे,  न  मुझसे

 

आज  विदा  की  उस  शाम  की  याद

स्मृतियों  को   संचित करती

विशादभरी  मुस्कान

मेरी अंगुलियों  में  तुम्हारी  अंगुलियाँ

मैं  अपने  अकेले  में  बैठा  सोचता

हमारा  स्नेह,  मेरी प्रिय

कुछ  ऐसी  कल्पना  ही  तो  रहा

------

विजय निकोर

(मौलिक व अप्रकाशित)

            

 

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Comment

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Comment by vijay nikore on June 7, 2021 at 11:32am

आपका हार्दिक आभार, मित्र ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 29, 2021 at 5:57am

आ. भाई विजय निकोर जी, सादर अभिवादन। अच्छी रचना हुई है । हार्दिक बधाई।

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