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नग़मा: जगाकर दिल में उम्मीदें दिलों को तोड़ने वालो

1222 1222 1222 1222

जगाकर दिल में उम्मीदें दिलों को तोड़ने वालो

हमारा क्या है हम तो बेसहारा हैं सो जी लेंगे

तुम्हारा दिल अगर टूटा तो फ़िर तुम जी न पाओगे

मिरे लख़्त-ए-जिगर सुन लो गमों को पी न पाओगे

जरा सा नर्म रक्खो इस गुमाँ के सख़्त लहजे को

ये चादर फट गयी गर ज़िंदगी की सी न पाओगे

यहाँ हर शय पे रहता है मिरी जाँ वक़्त का पहरा

अगर जो वक़्त बदला तो बचा हस्ती न पाओगे

हमें आदत है पीने की सो हम तो ज़ह्र भी पी लें

मगर तुम ज़िंदगी के घूँट कड़वे पी न पाओगे

हवाएँ गर्म भी होंगी हवाएँ सर्द भी होंगीं

कभी होंगी खिलाफ़त में कभी हमदर्द भी होंगी

मगर जो तुम पे मरते हैं तुम्हारी कद्र करते हैं

दगा देकर कभी उनको सुकून "आज़ी" न पाओगे

मौलिक व अप्रकाशित

आज़ी तमाम

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